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Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 4/25/7

40 Sukta
7 Mantra
4/25/7
Devata- वायुः, सविता Rishi- मृगारः Chhanda- पथ्यापङ्क्तिः Suktam- पापमोचन सूक्त
Mantra with Swara
उ॒प श्रेष्ठा॑ न आ॒शिषो॑ दे॒वयो॒र्धाम॑न्नस्थिरन्। स्तौमि॑ दे॒वं स॑वि॒तारं॑ च वा॒युं तौ नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥

उप॑ । श्रेष्ठा॑: । न॒: । आ॒ऽशिष॑: । दे॒वयो॑: । धाम॑न् । अ॒स्थि॒र॒न् । स्तौमि॑ । दे॒वम् । स॒वि॒तार॑म् । च॒ । वा॒युम् । तौ । न॒: । मु॒ञ्च॒त॒म् । अंह॑स: ॥२५.७॥

Mantra without Swara
उप श्रेष्ठा न आशिषो देवयोर्धामन्नस्थिरन्। स्तौमि देवं सवितारं च वायुं तौ नो मुञ्चतमंहसः ॥

उप । श्रेष्ठा: । न: । आऽशिष: । देवयो: । धामन् । अस्थिरन् । स्तौमि । देवम् । सवितारम् । च । वायुम् । तौ । न: । मुञ्चतम् । अंहस: ॥२५.७॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (न:) = हमारी (श्रेष्ठः आशिषः) = उत्तम आकांक्षाएँ (देवयो:) = वाय व सर्यदेव के धामन तेज में (उपास्थिरन्) = हमें उपस्थित करें-स्थिर करें। हम सदा सूर्य और वायु के सम्पर्क में जीवन बिताते हुए तेजस्वी बनें और हमारी इच्छाएँ शुभ बनी रहें, अर्थात् हमें इन दोनों देवों के सम्पर्क में शरीर व मन दोनों का स्वास्थ्य प्राप्त हो। २. मैं (देवम्) = दिव्य गुणों से युक्त (सवितारम्) = सूर्य को (च) = और (वायुम) = वायु को (स्तौमि) = स्तुत करता हूँ। इनके गुणों का ध्यान करते हुए इनके सम्पर्क में रहने का प्रयत्न करता हूँ। (तौ) = वे दोनों (न:) = हमें (अंहसः) = पाप से (मुञ्चतम्) = मुक्त करें।
Essence
हमारी सूर्य व वायु के सम्पर्क में निवास की शुभ इच्छा सदा बनी रहे। इसी से हम तेजस्वी व निष्पाप जीवनवाले बन पाएँगे। अगले सूक्त में भी 'मृगार' ही ऋषि है -
Subject
देवयोः धामन्