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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 4/24/2

40 Sukta
7 Mantra
4/24/2
Devata- इन्द्रः Rishi- मृगारः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- पापमोचन सूक्त
Mantra with Swara
य उ॒ग्रीणा॑मु॒ग्रबा॑हुर्य॒युर्यो दा॑न॒वानां॒ बल॑मारु॒रोज॑। येन॑ जि॒ताः सिन्ध॑वो॒ येन॒ गावः॒ स नो॑ मुञ्च॒त्वंह॑सः ॥

य: । उ॒ग्रीणा॑म् । उ॒ग्रऽबा॑हु: । य॒यु: । य: । दा॒न॒वाना॑म् । बल॑म् । आ॒ऽरु॒रोज॑ । येन॑ । जि॒ता: । सिन्ध॑व: । येन॑ । गाव॑: । स: । न॒: । मु॒ञ्च॒तु॒ । अंह॑स: ॥२४.२॥

Mantra without Swara
य उग्रीणामुग्रबाहुर्ययुर्यो दानवानां बलमारुरोज। येन जिताः सिन्धवो येन गावः स नो मुञ्चत्वंहसः ॥

य: । उग्रीणाम् । उग्रऽबाहु: । ययु: । य: । दानवानाम् । बलम् । आऽरुरोज । येन । जिता: । सिन्धव: । येन । गाव: । स: । न: । मुञ्चतु । अंहस: ॥२४.२॥

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Meaning
१. (यः) = जो (उग्रबाहुः) = उद्गुणहस्त-तेजस्वी भुजाओंवाला प्रभु (उग्रीणाम्) = उद्गुर्ण-प्रबल शत्रसेनाओं का (ययुः आक्रान्ता) = है-शत्रुसेनाओं पर आक्रमण करके उन्हें पराजित करनेवाला है। (यः) = जो प्रभु (दानवानाम्) = राक्षसी वृत्तिवालों के (बलम् आरुरोज) = सैन्य का भंग करता है-या सामर्थ्य को नष्ट करता है। २. (येन) = जिस प्रभु के द्वारा हमारे लिए (सिन्धवः) = नदियों को जिता-विजय किया जाता है और (येन) = जिस प्रभु से (गाव:) = भूमि का विजय किया जाता है। अध्यात्म में (सिन्धवः) = स्यन्दशील रेत:कण हैं तथा (गाव:) = ज्ञान की वाणियाँ हैं। प्रभु ही हमारे लिए इन रेत:कणों के रक्षण के द्वारा बुद्धि को तीन करके ज्ञान की वाणियों को प्राप्त कराते हैं। (सः न: अंहसः मुञ्चतु) = वे प्रभु हमें पापों से मुक्त करें।
Essence
प्रभु हमारे प्रबल शत्रुसैन्य पर आक्रमण करते हैं, दानवों के बल का भंग करते हैं। ये प्रभु ही हमारे लिए नदियों और भूमियों का विजय करते हैं। वे प्रभु हमें पापों से मुक्त करें।
Subject
येन जित: सिन्धवः, येन गाव: