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Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 4/23/7

40 Sukta
7 Mantra
4/23/7
Devata- प्रचेता अग्निः Rishi- मृगारः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- पापमोचन सूक्त
Mantra with Swara
यस्ये॒दं प्र॒दिशि॒ यद्वि॒रोच॑ते॒ यज्जा॒तं ज॑नित॒व्यं॑ च॒ केव॑लम्। स्तौम्य॒ग्निं ना॑थि॒तो जो॑हवीमि॒ स नो॑ मुञ्च॒त्वंह॑सः ॥

यस्य॑ । इ॒दम् । प्र॒ऽदिशि॑ । यत् । वि॒ऽरोच॑ते । यत् । जा॒तम् । ज॒नि॒त॒व्य᳡म् । च॒ । केव॑लम् । स्तौमि॑ । अ॒ग्निम् । ना॒थि॒त: । जो॒ह॒वी॒मि॒ । स: । न॒: । मु॒ञ्च॒तु॒ । अंह॑स: ॥२३.७॥

Mantra without Swara
यस्येदं प्रदिशि यद्विरोचते यज्जातं जनितव्यं च केवलम्। स्तौम्यग्निं नाथितो जोहवीमि स नो मुञ्चत्वंहसः ॥

यस्य । इदम् । प्रऽदिशि । यत् । विऽरोचते । यत् । जातम् । जनितव्यम् । च । केवलम् । स्तौमि । अग्निम् । नाथित: । जोहवीमि । स: । न: । मुञ्चतु । अंहस: ॥२३.७॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (इदम्) = यह सम्पूर्ण जगत् (यस्य प्रदिशि) = जिस अग्नि के प्रशासन में है, (यत् विरोचते) = जो ये ग्रह-नक्षत्रादि अन्तरिक्ष में चमकते हैं (च) = और (यत्) = जो (जातम्) = इस पृथिवी पर उत्पन्न हुआ है और (जनितव्यम्) =  भविष्य में उत्पन्न होनेवाला है, वह (केवलम्) = अनन्य साधारणरूप से जिसके प्रशासन में है, मैं उस (अग्निं स्तौमि) = अग्नि की स्तुति करता हूँ। २. (नाथित:) = [नाथ उपतापे, Harsh, trouble] वासनाओं से उपतप्त हुआ-हुआ मैं उस प्रभु को ही (जोहवीमि) = पुकारता हूँ। (स:) = वे प्रभु ही (न:) = हमें (अंहस: मञ्चत) = पाप से मुक्त करें-मेरी शक्ति तो इन काम-क्रोध आदि को जीत सकने की नहीं है।
Essence
प्रभु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के शासक हैं। मैं प्रभु का ही स्तवन करता हूँ। शत्रुओं से सन्तत किया गया मैं प्रभु को ही पुकारता हूँ। वे प्रभु मुझे पापों से मुक्त करें।

 

अगले सूक्त का ऋषि भी 'मृगार' ही है -

 
Subject
स्तौमि जोहवीमि