Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 4/23/1

40 Sukta
7 Mantra
4/23/1
Devata- प्रचेता अग्निः Rishi- मृगारः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- पापमोचन सूक्त
Mantra with Swara
अ॒ग्नेर्म॑न्वे प्रथ॒मस्य॒ प्रचे॑तसः॒ पाञ्च॑जन्यस्य बहु॒धा यमि॒न्धते॑। विशो॑विशः प्रविशि॒वांस॑मीमहे॒ स नो॑ मुञ्च॒त्वंह॑सः ॥

अ॒ग्ने: । म॒न्वे॒ । प्र॒थ॒मस्य॑ । प्रऽचे॑तस: । पाञ्च॑ऽजन्यस्य । ब॒हु॒ऽधा । यम् । इ॒न्धते॑ । विश॑:ऽविश: । प्र॒वि॒शि॒ऽवास॑म् । ई॒म॒हे॒ । स: । न॒: । मु॒ञ्च॒तु॒ । अंह॑स: ॥२३.१॥

Mantra without Swara
अग्नेर्मन्वे प्रथमस्य प्रचेतसः पाञ्चजन्यस्य बहुधा यमिन्धते। विशोविशः प्रविशिवांसमीमहे स नो मुञ्चत्वंहसः ॥

अग्ने: । मन्वे । प्रथमस्य । प्रऽचेतस: । पाञ्चऽजन्यस्य । बहुऽधा । यम् । इन्धते । विश:ऽविश: । प्रविशिऽवासम् । ईमहे । स: । न: । मुञ्चतु । अंहस: ॥२३.१॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. मैं (अग्नेः) = उस अग्रणी प्रभु का (मन्वे) = मनन व चिन्तन करता हूँ जोकि (प्रथमस्य) = सर्वमुख्य व सर्वव्यापक हैं [प्रथ विस्तारे], (प्रचेतसः) = प्रकृष्ट ज्ञानवाले–सर्वज्ञ हैं और (पाजन्यस्य) = पञ्चजनों का हित करनेवाले हैं। 'पञ्च यज्ञशील जन' पञ्चजन हैं। ये प्रभु को सदा प्रिय होते हैं। उस प्रभु का मैं मनन करता हूँ (यम्) = जिसे (बहुधा) = अनेक प्रकार से-नानाविध यत्नों से (इन्धते) = साधक लोग अपने हृदयदेश में दीस करते हैं। २. (विशः विश: प्रविशिवांसम्) = सब प्रजाओं में प्रविष्ट हुए-हुए उस प्रभु को (ईमहे) = हम प्रार्थित करते हैं। (सः) = वे प्रभु (न:) = हमें (अंहसः) = सब अनर्थों के कारण पाप से (मुञ्चतु) = मुक्त करें-वे प्रभु हमें पापों से छुड़ाएँ।
Essence
हम उस प्रभु का स्मरण करें जोकि 'अग्नि, प्रथम, प्रचेता व पाञ्चजन्य' हैं। हम सबके अन्दर वे प्रभु रह रहे हैं। उन्हीं से हम आराधना करते हैं कि वे हमें पापों से मुक्त करें।
Subject
'प्रथम-प्रचेता-पाञ्चजन्य' प्रभु