Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 4/21/3

40 Sukta
7 Mantra
4/21/3
Devata- गोसमूहः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- गोसमूह सूक्त
Mantra with Swara
न ता न॑शन्ति॒ न द॑भाति॒ तस्क॑रो॒ नासा॑मामि॒त्रो व्य॒थिरा द॑धर्षति। दे॒वांश्च॒ याभि॒र्यज॑ते॒ ददा॑ति च॒ ज्योगित्ताभिः॑ सचते॒ गोप॑तिः स॒ह ॥

न । ता: । न॒श॒न्ति॒ । न । द॒भा॒ति॒ । तस्क॑र: । न । आ॒सा॒म् । आ॒मि॒त्र: । व्य॒थि: । आ । द॒ध॒र्ष॒ति॒ । दे॒वान् । च॒ । याभि॑: । यज॑ते । ददा॑ति । च॒ । ज्योक् । इत् । ताभि॑: । स॒च॒ते॒ । गोऽप॑ति: । स॒ह ॥२१.३॥

Mantra without Swara
न ता नशन्ति न दभाति तस्करो नासामामित्रो व्यथिरा दधर्षति। देवांश्च याभिर्यजते ददाति च ज्योगित्ताभिः सचते गोपतिः सह ॥

न । ता: । नशन्ति । न । दभाति । तस्कर: । न । आसाम् । आमित्र: । व्यथि: । आ । दधर्षति । देवान् । च । याभि: । यजते । ददाति । च । ज्योक् । इत् । ताभि: । सचते । गोऽपति: । सह ॥२१.३॥

Meaning
१. (ता:) = प्रभु से दी गई वे गौएँ (न नशन्ति) = नष्ट नहीं होती हैं, (तस्कर:) = चोर (न दभाति) = इन्हें हिसित नहीं करता। (आसाम्) = इन गौओं का (आमित्र:) = [अमित्रजनित:] शत्रुओं से किया हुआ (व्यथि:) = व्यथाजनक आयुध न (आदधर्षति) = धर्षण नहीं करता-शत्रुओं के अस्त्र इन्हें पीड़ित नहीं करते। २. (च) = और (याभि:) = जिन गौओं के द्वारा (देवान् यजते) = क्षीर आदि हवियों को प्राप्त करके दवेयज्ञ करता है (च) = और (ददाति) = जिन गौओं को दक्षिणा के रूप में देता है, (ताभि: सह) = उन गौओं के साथ यह (गोपति:) = गौओं की रक्षा करनेवाला यज्ञशील पुरुष (ज्योग् इत्) = निश्चय से चिरकाल तक (सचते) = समवेत होता है-इन गौओं से कभी पृथक् नहीं होता।
Essence
यज्ञशील पुरुष का गौओं के साथ सदा सम्बन्ध रहता है। इनके द्वारा ही वह देवयज्ञ कर पाता है और दक्षिणा देता है। ये गौएँ चोरों और शत्रुओं के अस्त्रों से हिंसित नहीं होती।
Subject
देवयज्ञ व दक्षिणा की साधनभूत गौएँ

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.