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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 4/20/6

40 Sukta
9 Mantra
4/20/6
Devata- मातृनामौषधिः Rishi- मातृनामा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- पिशाचक्षयण सूक्त
Mantra with Swara
द॒र्शय॑ मा यातु॒धाना॑न्द॒र्शय॑ यातुधा॒न्यः॑। पि॑शा॒चान्त्सर्वा॑न्दर्श॒येति॒ त्वा र॑भ ओषधे ॥

द॒र्शय॑ । मा॒ । या॒तु॒ऽधाना॑न् । द॒र्शय॑ । या॒तु॒ऽधा॒न्य᳡: । पि॒शा॒चान् । सर्वा॑न् । द॒र्श॒य॒ । इति॑ । त्वा॒ । आ । र॒भे॒ । ओ॒ष॒धे॒ ॥२०.६॥

Mantra without Swara
दर्शय मा यातुधानान्दर्शय यातुधान्यः। पिशाचान्त्सर्वान्दर्शयेति त्वा रभ ओषधे ॥

दर्शय । मा । यातुऽधानान् । दर्शय । यातुऽधान्य: । पिशाचान् । सर्वान् । दर्शय । इति । त्वा । आ । रभे । ओषधे ॥२०.६॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. है (ओषधे) = दोषों को दहन करनेवाली वेदमातः । मैं (त्वा आरभे) = तेरा आश्रय करता हूँ, तुझे अपनाता हूँ। तू (सर्वान् पिशाचान्) = सब पिशाचों को-औरों का मांस खानेवालों को [पिशितम् अश्नन्ति] (दर्शय इति) = मुझे दिखला, इसलिए मैं तेरा आश्रय लेता हूँ। २. (मा) = मुझे (यातुधानान्) = पीड़ा को आहित करनेवालों को (दर्शय) = दिखा तथा (यातुधान्य:) = इन यातुधानों की पलियों को (दर्शय) = दिखा।
Essence
वेद द्वारा हम 'यातुधान, यातुधानी व पिशाचों' के लक्षणों को समझते हुए इनसे बचें।
Subject
'यातुधान व पिशाच' का लक्षण
Information
शरीरस्थ कुछ रोगकृमि भी इसप्रकार के हैं, जो शरीर में पीड़ा के कारण बनते हैं। अन्य रोगकृमि मांस को खा जाते हैं और हमें अमांस [दुर्बल, emacited] कर देते हैं। वेद द्वारा इन्हें समझकर हम अपने को इनका शिकार होने से बचाएँ।