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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 4/20/5

40 Sukta
9 Mantra
4/20/5
Devata- मातृनामौषधिः Rishi- मातृनामा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- पिशाचक्षयण सूक्त
Mantra with Swara
आ॒विष्कृ॑णुष्व रू॒पाणि॒ मात्मान॒मप॑ गूहथाः। अथो॑ सहस्रचक्षो॒ त्वं प्रति॑ पश्याः किमी॒दिनः॑ ॥

आ॒वि: । कृ॒णु॒ष्व॒ । रू॒पाणि॑ । मा । आ॒त्मान॑म् । अप॑ । गू॒ह॒था॒: ।अथो॒ इति॑ । स॒ह॒स्र॒च॒क्षो॒ इति॑ सहस्रऽचक्षो । त्वम् । प्रति॑ । प॒श्या॒: । कि॒मी॒दिन॑: ॥२०.५॥

Mantra without Swara
आविष्कृणुष्व रूपाणि मात्मानमप गूहथाः। अथो सहस्रचक्षो त्वं प्रति पश्याः किमीदिनः ॥

आवि: । कृणुष्व । रूपाणि । मा । आत्मानम् । अप । गूहथा: ।अथो इति । सहस्रचक्षो इति सहस्रऽचक्षो । त्वम् । प्रति । पश्या: । किमीदिन: ॥२०.५॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे वेदमातः! तू (रूपाणि) = संसार के सब रूपवान् पदार्थों को (आविष्कृणुष्व) = हमारे लिए प्रकट कर-हमें इन पदार्थों का ठीक-ठीक ज्ञान दे। तू (आत्मानम्) = अपने-आपको (मा अप गृहथा:) = हमसे मत छिपा। हम तेरा दर्शन करें और तेरे द्वारा संसार के सब रूपों को-रूपवान् पदार्थों को समझें। २. हे (सहस्त्राक्षो) = अनन्त दर्शन-शक्तिवाले प्रभो! (अथ उ) = अब निश्चय से इस वेदमाता के द्वारा (त्वम्) = आप (किमीदिन:) = [किम् इदानी किम् इदानीम् इति गूढं सञ्चरतः राक्षसान्] 'अब क्या भोगें, अब क्या भोगूं' इसप्रकार स्वार्थ-भोग के लिए औरों को पीड़ित करनेवाले राक्षसों को (प्रतिपश्या:) = [प्रतिदर्शय] एक-एक करके हमें दिखलाइए। इन्हें सम्यक् देखकर हम अपने को इनसे बचा सकें। इनसे हम सदा सावधान रह सकें।
Essence
हम वेदवाणी द्वारा सब रूपवान् पदार्थों व प्राणियों को समझें। हम भोगप्रधान जीवनवाले राक्षसीवृत्ति के पुरुषों को समझकर उनसे अपना रक्षण कर सकें।
Subject
प्रतिपश्या: 'किमीदिन:'