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Atharvaveda - Mantra 8

Atharvaveda 4/2/8

40 Sukta
8 Mantra
4/2/8
Devata- आत्मा Rishi- वेनः Chhanda- उपरिष्टाज्ज्योतिस्त्रिष्टुप् Suktam- आत्मविद्या सूक्त
Mantra with Swara
आपो॑ व॒त्सं ज॒नय॑न्ती॒र्गर्भ॒मग्रे॒ समै॑रयन्। तस्यो॒त जाय॑मान॒स्योल्ब॑ आसीद्धिर॒ण्ययः॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

आप॑: । व॒त्सम् । ज॒नय॑न्ती: । गर्भ॑म् । अग्रे॑ । सम् । ऐ॒र॒य॒न् । तस्य॑ । उ॒त । जाय॑मानस्य । उल्ब॑: । आ॒सी॒त् । हि॒र॒ण्यय॑: । कस्मै॑ । दे॒वाय॑ । ह॒विषा॑ । वि॒धे॒म॒ ॥२.८॥

Mantra without Swara
आपो वत्सं जनयन्तीर्गर्भमग्रे समैरयन्। तस्योत जायमानस्योल्ब आसीद्धिरण्ययः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥

आप: । वत्सम् । जनयन्ती: । गर्भम् । अग्रे । सम् । ऐरयन् । तस्य । उत । जायमानस्य । उल्ब: । आसीत् । हिरण्यय: । कस्मै । देवाय । हविषा । विधेम ॥२.८॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (आप:) = इस धुलोक ने (वसं जनयन्ती:) = सबके निवासस्थानभूत इस संसार को जन्म देने के हेतु से [वसन्ति अस्मिन् इति वत्सः] (अग्रे) = सृष्टि के आरम्भ में (गर्भम) = गर्भरूप से अवस्थित इस संसार को (समैरयन्) = प्रेरित किया-गतिमय किया। २. (उत) = और जायमानस्य उत्पन्न होते हुए (तस्य) = उस बुलोक के गर्भरूप संसार का (उल्ब:) = गर्भ-वेष्टन (हिरण्ययः आसीत्) = ज्योतिर्मय प्रभु ही थे-प्रभु ने ही इन सबको वेष्टित किया हुआ था। (कस्मै) = उस आनन्दमय (देवाय) = प्रकाशमय प्रभु के लिए (हविषा विधेम) = दानपूर्वक अदन द्वारा पूजन करें।
Essence
युलोक से जन्म लेनेवाला यह सारा संसार प्रभु से वेष्टित था। हम उस ज्योतिर्मय प्रभु का हवि के द्वारा अर्चन करें।
Subject
हिरण्यय उत्सः
Special
अगले सूक्त का ऋषि 'अथर्वा' है-प्रभु-पूजन से अपनी वृत्ति को स्थिर बनानेवाला। वह प्रयत्न करके कामादि शत्रुओं को अपने से दूर करता है।