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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 4/2/6

40 Sukta
8 Mantra
4/2/6
Devata- आत्मा Rishi- वेनः Chhanda- पुरोऽनुष्टुप् Suktam- आत्मविद्या सूक्त
Mantra with Swara
आपो॒ अग्रे॒ विश्व॑माव॒न्गर्भं॒ दधा॑ना अ॒मृता॑ ऋत॒ज्ञाः। यासु॑ दे॒वीष्वधि॑ दे॒व आसी॒त्कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

आप॑: । अग्रे॑ । विश्व॑म् । आ॒व॒न् । गर्भ॑म् । दधा॑ना: । अ॒मृता॑: । ऋ॒त॒ऽज्ञा: । यासु॑ । दे॒वीषु॑ । अधि॑ । दे॒व: । आसी॑त् । कस्मै॑ । दे॒वाय॑ । ह॒विषा॑ । वि॒धे॒म॒ ॥२.६॥

Mantra without Swara
आपो अग्रे विश्वमावन्गर्भं दधाना अमृता ऋतज्ञाः। यासु देवीष्वधि देव आसीत्कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥

आप: । अग्रे । विश्वम् । आवन् । गर्भम् । दधाना: । अमृता: । ऋतऽज्ञा: । यासु । देवीषु । अधि । देव: । आसीत् । कस्मै । देवाय । हविषा । विधेम ॥२.६॥

Meaning
१. (आपो वै द्यौ) = [ शत०६.४.१.९] (आपो वै दिव्यं नभः) [शत०६.८.५.३] इन वाक्यों के अनुसार धुलोक [आकाश] ही आप:' है। यह आकाश भी प्रभु से प्रादुर्भूत होता है-तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश: सम्भूतः । इस आकाश में ही सारा संसार गर्भरूप से रहता है। (आपः) = यह आकाश व दिव्य नभ [Nebula] ही (अग्रे) = आरम्भ में (विश्वम्) = सम्पूर्ण विश्व को (आवन्) = अपने में [अरक्षत्] रखता था, (गर्भं दधाना:) = इन्होंने ही इसे गर्भरूप से धारण किया हुआ था। (अमृता:) = यह धुलोक अविनाशी है। स्वामी दयानन्द के शब्दों में 'उत्पन-सा होता है, वस्तुत: यह तो सदा से है। (ऋतज्ञा:) = ये द्युलोक ही वृष्टि-जल को [ऋत-rain-water] जाननेवाले हैं, यहीं से वृष्टि होती है। २. (यासु) = जिस (देवीषु) = प्रकाशमय ह्युलोक में (अधि देवा आसीत्) = अधिष्ठातरूपेण प्रभु थे। प्रभु से अधिष्ठित ही यह आकाश सम्पूर्ण विश्व को जन्म देता है। उस (कस्मै) = आनन्दमय (देवाय) = सर्वप्रद प्रभु के लिए (हविषा) = दानपूर्वक अदन के द्वारा (विधेम) = पूजा करें।
Essence
सम्पूर्ण संसार इस आकाश के गर्भ में है। प्रभु से अधिष्ठित आकाश विश्व को जन्म देता है। इस प्रभु के लिए हम हवि द्वारा पूजन करनेवाले हों।
Subject
अपो वै द्यौः

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