Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 4/2/5

40 Sukta
8 Mantra
4/2/5
Devata- आत्मा Rishi- वेनः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- आत्मविद्या सूक्त
Mantra with Swara
यस्य॒ विश्वे॑ हि॒मव॑न्तो महि॒त्वा स॑मु॒द्रे यस्य॑ र॒सामिदा॒हुः। इ॒माश्च॑ प्र॒दिशो॒ यस्य॑ बा॒हू कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

यस्य॑ । विश्वे॑ । हि॒मऽव॑न्त: । म॒हि॒ऽत्वा । स॒मु॒द्रे । यस्य॑ । र॒साम् । इत् । आ॒हु: । इ॒मा: । च॒ । प्र॒ऽदिश॑: । यस्य॑ । बा॒हू इति॑ । कस्मै॑ । दे॒वाय॑ । ह॒विषा॑ । वि॒धे॒म॒ ॥२.५॥

Mantra without Swara
यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा समुद्रे यस्य रसामिदाहुः। इमाश्च प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥

यस्य । विश्वे । हिमऽवन्त: । महिऽत्वा । समुद्रे । यस्य । रसाम् । इत् । आहु: । इमा: । च । प्रऽदिश: । यस्य । बाहू इति । कस्मै । देवाय । हविषा । विधेम ॥२.५॥

Meaning
१. उस आनन्दमय देव का हम हवि के द्वारा पूजन करें (यस्य महित्वा) = जिसकी महिमा से (विश्वे) = सब (हिमवन्त:) = हिमाच्छादित पर्वत खड़े हैं, (यस्य) = जिसकी महिमा से (इत्) = ही (समुद्रे) = समुद्र में भी (रसाम्) = रसों की उत्पत्ति-स्थान पृथिवी को (आहुः) = कहते हैं। चारों ओर समुद्र है, बीच में यह पृथिवी है। समुद्रों से आवृत यह पृथिवी भी प्रभु की महिमा का प्रकश कर रही है। २. (च) = और (इमा:) = ये (प्रदिश:) = फैली हुई दिशाएँ (यस्य) = जिस प्रभु की (बहू) = बाहु स्थानापन हैं, उस आनन्दमय देव का हम हवि के द्वारा पूजन करें।
Essence
हिमाच्छादित पर्वतों में, समुद्र के मध्य में स्थित इस पृथिवी में, इन विस्तृत दिशाओं में सर्वत्र प्रभु क महिमा का प्रकाश हो रहा है। हम इस प्रभु का हवि के द्वारा पूजन करें।
Subject
'पर्वतों, समुद्रों, पृथिवी व दिशाओं में प्रभु की महिमा का दर्शन

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.