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Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 4/19/7

40 Sukta
8 Mantra
4/19/7
Devata- अपामार्गो वनस्पतिः Rishi- शुक्रः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- अपामार्ग सूक्त
Mantra with Swara
प्र॒त्यङ्हि सं॑ब॒भूवि॑थ प्रती॒चीन॑फल॒स्त्वम्। सर्वा॒न्मच्छ॒पथाँ अधि॒ वरी॑यो यावया व॒धम् ॥

प्र॒त्यङ् । हि । स॒म्ऽब॒भूवि॑थ । प्र॒ती॒चीन॑ऽफल: । त्वम् । सर्वा॑न् । मत् । श॒पथा॑न् । अधि॑ । वरी॑य: । य॒व॒य॒ । व॒धम् ॥१९.७॥

Mantra without Swara
प्रत्यङ्हि संबभूविथ प्रतीचीनफलस्त्वम्। सर्वान्मच्छपथाँ अधि वरीयो यावया वधम् ॥

प्रत्यङ् । हि । सम्ऽबभूविथ । प्रतीचीनऽफल: । त्वम् । सर्वान् । मत् । शपथान् । अधि । वरीय: । यवय । वधम् ॥१९.७॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे अपामार्ग! (त्वम्) = तू (हि) = निश्चय से (प्रत्यङ्) = हमारी ओर गतिवाला होता हुआ-हमारे अन्दर प्रास होता हुआ (प्रतीचीनफल:) = हमारे विरोधियों का-रोगजनक कृमियों का विशरण [जिफला विशरणे] करनेवाला (संबभूविथ) = होता है। तु हमारे शरीरों में प्रविष्ट होकर सब रोगकृमियों को समाप्त कर देता है। २. तू (मत्) = मुझसे (सर्वान्) = सब (शपथान्) = रोगपीड़ा-जनक आक्रोशों का तथा (वधम्) = रोगजनित हिंसन को (वरीय:) = [उस्तरम्] खूब ही-बहुत ही (अधियावय) = आधिक्येन पृथक् कर । तेरै प्रयोग से न तो हमें रोगजनित पीड़ाएँ प्राप्त हों और न ही यह रोग हमें नष्ट करनेवाला हो।
Essence
शरीर में पहुँचकर अपामर्ग रोगकृमियों का विनाश कर देता है और हमें रोगजनित पीड़ाओं व बाधाओं से बचाता है।

 
Subject
'शपथ व वध'-निराकरण