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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 4/18/2

40 Sukta
8 Mantra
4/18/2
Devata- अपामार्गो वनस्पतिः Rishi- शुक्रः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- अपामार्ग सूक्त
Mantra with Swara
यो दे॑वाः कृ॒त्यां कृ॒त्वा हरा॒दवि॑दुषो गृ॒हम्। व॒त्सो धा॒रुरि॑व मा॒तरं॒ तं प्र॒त्यगुप॑ पद्यताम् ॥

य: । दे॒वा॒: । कृ॒त्याम् । कृ॒त्वा । हरा॑त् । अवि॑दुष: । गृ॒हम् । व॒त्स: । धा॒रु:ऽइ॑व । मा॒तर॑म् । तम् । प्र॒त्यक् । उप॑ । प॒द्य॒ता॒म् ॥१८.२॥

Mantra without Swara
यो देवाः कृत्यां कृत्वा हरादविदुषो गृहम्। वत्सो धारुरिव मातरं तं प्रत्यगुप पद्यताम् ॥

य: । देवा: । कृत्याम् । कृत्वा । हरात् । अविदुष: । गृहम् । वत्स: । धारु:ऽइव । मातरम् । तम् । प्रत्यक् । उप । पद्यताम् ॥१८.२॥

Meaning
१. हे (देवा:) = देवो! (य:) = जो (कृत्या कृत्वा) = हिंसा का प्रयोग करके (अ-विदुषः) = छल-कपट की सम्भावना को न समझते हुए [विद् जानना] अजान पुरुष के (गृहं हरात) = घर का अपहरण करता है-उसे हानि पहुँचता है। यह हिंसा-कर्म (तम् प्रत्यक्) = उसकी ओर लौटकर उसे उसी प्रकार (उपपद्यताम्) = प्राप्त हो (इव) = जैसेकि (धारु:) = [धेट पाने] स्तनपान करनेवाला (वत्सः) = बछड़ा (मातरम्) = माता के प्रति ही जाता है। २. जो छल-कपटपूर्वक दूसरों का हिंसन करने का प्रयत्न करता है, वह अन्ततः उस हिंसा का स्वयं ही शिकार हो जाता है।
Essence
प्रभु की सब प्राकृतिक शक्तियाँ ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देती हैं कि हिंसा करनेवाला उस हिंसा-प्रयोग का स्वंय ही शिकार हो जाता है।
Subject
हिंसा द्वारा हिंसक का हिंसन

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