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Atharvaveda - Mantra 9

Atharvaveda 4/14/9

40 Sukta
9 Mantra
4/14/9
Devata- आज्यम्, अग्निः Rishi- भृगुः Chhanda- जगती Suktam- स्वर्ज्योति प्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
शृ॒तम॒जं शृ॒तया॒ प्रोर्णु॑हि त्व॒चा सर्वै॒रङ्गैः॒ संभृ॑तं वि॒श्वरू॑पम्। स उत्ति॑ष्ठे॒तो अ॑भि॒ नाक॑मुत्त॒मं प॒द्भिश्च॒तुर्भिः॒ प्रति॑ तिष्ठ दि॒क्षु ॥

शृ॒तम् । अ॒जम् । शृ॒तया॑ । प्र । ऊ॒र्णु॒हि॒ । त्व॒चा । सर्वै॑: । अङ्गै॑: । सम्ऽभृ॑तम् । वि॒श्वऽरू॑पम् । स: । उत् । ति॒ष्ठ॒ । इ॒त: । अ॒भि । नाक॑म् । उ॒त्ऽत॒मम् । प॒त्ऽभि: । च॒तु:ऽभि॑: । प्रति॑ । ति॒ष्ठ॒ । दि॒क्षु॒ ॥१४.९॥

Mantra without Swara
शृतमजं शृतया प्रोर्णुहि त्वचा सर्वैरङ्गैः संभृतं विश्वरूपम्। स उत्तिष्ठेतो अभि नाकमुत्तमं पद्भिश्चतुर्भिः प्रति तिष्ठ दिक्षु ॥

शृतम् । अजम् । शृतया । प्र । ऊर्णुहि । त्वचा । सर्वै: । अङ्गै: । सम्ऽभृतम् । विश्वऽरूपम् । स: । उत् । तिष्ठ । इत: । अभि । नाकम् । उत्ऽतमम् । पत्ऽभि: । चतु:ऽभि: । प्रति । तिष्ठ । दिक्षु ॥१४.९॥

Meaning
१. गतमन्त्रों में वर्णित साधना के अनुसार (शृतम्) = जिसका ठीक परिपाक हुआ है, उस (अजम्) = गतिशीलता के द्वारा बुराइयों को परे फेंकनेवाले व्यक्ति को (शृतया) = त्वचा से (प्रोहि) = आच्छादित कर, अर्थात् तपस्या के द्वारा हम त्वचा को कठोर बनाएँ। इसप्रकार शरीर बीमारियों का शिकार नहीं होगा। इस 'अज' में (सर्वैः अङ्ग:) = पूर्ण स्वस्थ [सर्व-Whole] अङ्गों से (विश्वरूपं संभृतम्) = सम्पूर्ण शरीर का सौंदर्य संभृत हुआ है। २.हे अज ! (स:) = वह तू (इत:) = यहाँ से-इस पार्थिवलोक में निवास से (नाकम् अभि) = मोक्ष की ओर (उत्तिष्ठ) = उठ खड़ा हो। तू (दिक्ष) = सब दिशाओं में, अर्थात् सर्वत्र (चतुर्भिः पद्धिः) = 'धमार्थ-काममोक्ष रूप चारों पगों के द्वारा (प्रतितिष्ठ) = जीवन-यात्रा में प्रस्थित हो। अथवा 'स्वाध्याय, यज्ञ, तप व दान' रूप चारों धर्मों का पालन करता हुआ तू मोक्ष की ओर बढ़।
Essence
हम तपस्या की अग्नि में अपना ठीक परिपाक करें। हमारी त्वचा तपः परिपक्व हो, शरीर स्वस्थ अङ्गों के सौन्दर्य से परिपूर्ण हो तथा 'स्वाध्याय, यज्ञ, तप व दान' रूप चार धर्मों के पालन के द्वारा हम मोक्ष की ओर बढ़ें।
Subject
'शृत अज'
Special
इसप्रकार जीवन का ठीक परिपाक करनेवाला अज 'अथर्वा' बनता है-स्थिर वृत्ति का। यही अगले सूक्त का ऋषि है।

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