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Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 4/14/7

40 Sukta
9 Mantra
4/14/7
Devata- आज्यम्, अग्निः Rishi- भृगुः Chhanda- प्रस्तारपङ्क्तिः Suktam- स्वर्ज्योति प्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
पञ्चौ॑दनं प॒ञ्चभि॑र॒ङ्गुलि॑भि॒र्दर्व्योद्ध॑र पञ्च॒धैतमो॑द॒नम्। प्राच्यां॑ दि॒शि शिरो॑ अ॒जस्य॑ धेहि॒ दक्षि॑णायां दि॒शि दक्षि॑णं धेहि पा॒र्श्वम् ॥

पञ्च॑ऽओदनम् । प॒ञ्चऽभि॑: । अ॒ङ्गुलि॑ऽभि: । दर्व्या॑ । उत् । ह॒र॒ । प॒ञ्च॒ऽधा । ए॒तम् । ओ॒द॒नम् । प्राच्या॑म् । दि॒शि । शिर॑: । अ॒जस्य॑ । धे॒हि॒ । दक्षि॑णायाम् । दि॒शि । दक्षि॑णम् । धे॒हि॒ । पा॒र्श्वम् ॥१४.७॥

Mantra without Swara
पञ्चौदनं पञ्चभिरङ्गुलिभिर्दर्व्योद्धर पञ्चधैतमोदनम्। प्राच्यां दिशि शिरो अजस्य धेहि दक्षिणायां दिशि दक्षिणं धेहि पार्श्वम् ॥

पञ्चऽओदनम् । पञ्चऽभि: । अङ्गुलिऽभि: । दर्व्या । उत् । हर । पञ्चऽधा । एतम् । ओदनम् । प्राच्याम् । दिशि । शिर: । अजस्य । धेहि । दक्षिणायाम् । दिशि । दक्षिणम् । धेहि । पार्श्वम् ॥१४.७॥

Meaning
१. जैसे ओदन [भात] अंगुलियों व दवी [कड़छी] से निकाला जाता है, उसी प्रकार ज्ञान का ओदन [भोजन] भी अंगुलियों से [अगि गती], अर्थात् गतिशीलता से तथा दीं से अर्थात् [द विदारणे] वासनाओं के विदारण से उद्धृत हुआ करता है। पाँच ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त होनेवाला यह ओदन 'पञ्चौदन' कहलाता है। प्रभु जीव से कहते हैं कि तू (पञ्चभिः अंगुलिभिः) = पाँचों ज्ञानेन्द्रियों की सम्यग् गतियों के द्वारा तथा (दर्व्या) = वासना-विदारण के द्वारा (पञ्चधा) = पाँच भागों में बँटे हुए 'शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध' भेद से पाँच प्रकार के एतं (ओदनम्) = इस जान को जोकि 'आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी' रूप पाँचों भूतों का ज्ञान होने से (पञ्चौदनम्) = पञ्चौदन कहलता है, उस ज्ञान को (उद्धर) = कुएँ से पानी प्राप्त करने की भांति आचार्यों से प्राप्त कर । २. ज्ञान को प्राप्त करता हुआ तू (अजस्य) = [अज गतिक्षेपणयो:] गति के द्वारा सब बुराइयों को परे फेंकनेवाले उस आत्मा के (शिर:) = शरीरस्थ सिर [मस्तिष्क] को (प्राच्यां दिशि धेहि)-प्राची दिशा में स्थापित कर । यह ज्ञान-प्राप्ति के कार्य में निरन्तर प्रगतिशील [प्र अञ्च] हो। मस्तिष्क का प्राची में स्थापन यही है कि यह ज्ञान-प्राप्ति में निरन्तर आगे और आगे बढ़ता चले। २. इस अज के (दक्षिण पाश्वम्) = दाहिने पासे को (दक्षिणायां दिशि) = दक्षिण दिशा में धेहि-स्थापित कर। इस अज के शरीर का यह दक्षिण हस्त कार्यों को दाक्षिण्य से करनेवाला हो। ज्ञानी पुरुष को कर्मों को कुशलता से करना ही शोभा देता है।
Essence
पाँचों ज्ञानेन्द्रियों की ठीक गतियों व वासना-विनाश के द्वारा हम आचार्यों से पञ्चभूतात्मक संसार का ज्ञान प्राप्त करें। मस्तिष्क को जान-प्राप्ति के मार्ग में निरन्तर गतिबाला बनाएँ तथा हमारा दक्षिण हस्त दाक्षिण्य से कर्म करनेवाला हो।
Subject
पञ्चौदन

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