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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 4/14/1

40 Sukta
9 Mantra
4/14/1
Devata- आज्यम्, अग्निः Rishi- भृगुः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- स्वर्ज्योति प्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
अ॒जो ह्यग्नेरज॑निष्ट॒ शोका॒त्सो अ॑पश्यज्जनि॒तार॒मग्रे॑। तेन॑ दे॒वा दे॒वता॒मग्र॑ आय॒न्तेन॒ रोहा॑न्रुरुहु॒र्मेध्या॑सः ॥

अ॒ज: । हि । अ॒ग्ने: । अज॑निष्ट । शोका॑त् । स: । अ॒प॒श्य॒त् । ज॒नि॒तार॑म् । अग्ने॑ । तेन॑ । दे॒वा: । दे॒वता॑म् । अग्रे॑ । आ॒य॒न् । तेन॑ । रोहा॑न् । रु॒रु॒हु॒: । मेध्या॑स: ॥१४.१॥

Mantra without Swara
अजो ह्यग्नेरजनिष्ट शोकात्सो अपश्यज्जनितारमग्रे। तेन देवा देवतामग्र आयन्तेन रोहान्रुरुहुर्मेध्यासः ॥

अज: । हि । अग्ने: । अजनिष्ट । शोकात् । स: । अपश्यत् । जनितारम् । अग्ने । तेन । देवा: । देवताम् । अग्रे । आयन् । तेन । रोहान् । रुरुहु: । मेध्यास: ॥१४.१॥

Meaning
१. (अग्ने:) = उस अग्रणी प्रभु के (शोकात्) = दीपन से [शुच to illuminate], प्रकाश से (हि) = ही (अजः अजनिष्टः) = जीवात्मा गति के द्वारा सब बुराइयों को परे फेंकनेवाला बनता है [अज गतिक्षेपणयोः] । (स:) = यह बुराइयों को परे फेंकनेवाला जीव (जानितारम्) = उस उत्पादक प्रभु को (अग्ने) = सामने (अपश्यत्) = देखता है। २. यह परमात्मा को इस रूप में देखता है कि (तेन) = उस प्रभु से ही (देवा:) = सब देव (अग्ने)= सर्वप्रथम (देवताम्) = देवत्व को (आयन्) = प्राप्त होते हैं। सूर्यादि देवों को प्रभु ही दीसि प्राप्त कराते हैं। इसीप्रकार (मेध्यासः) = पवित्र जीवनवाले पुरुष (तेन) = उस प्रभु के द्वारा ही (रोहान् रुरुहु:) = उन्नति-शिखरों पर आरोहण करते है। बुद्धिमान पुरुष प्रभ से ही बुद्धि प्रास करते हैं, बलवानों को वे प्रभु ही बल देते हैं।
Essence
प्रभु के दीपन से जीव सब बुराइयों को दूर कर पाता है। अब यह प्रभु-दर्शन करता है और देखता है कि प्रभु से ही सूर्यादि सब देव देवत्व को प्रास होते हैं तथा सब पवित्र जीव प्रभु से ही उन्नति-शिखरों पर आरोहण कर पाते हैं।
Subject
- जनित-दर्शन

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