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Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 4/12/7

40 Sukta
7 Mantra
4/12/7
Devata- वनस्पतिः Rishi- ऋभुः Chhanda- बृहती Suktam- रोहिणी वनस्पति सूक्त
Mantra with Swara
यदि॑ क॒र्तं प॑ति॒त्वा सं॑श॒श्रे यदि॒ वाश्मा॒ प्रहृ॑तो ज॒घान॑। ऋ॒भू रथ॑स्ये॒वाङ्गा॑नि॒ सं द॑ध॒त्परु॑षा॒ परुः॑ ॥

यदि॑ । क॒र्तम् । प॒ति॒त्वा । स॒म्ऽश॒श्रे । यदि॑ । वा॒ । अश्मा॑ । प्रऽहृ॑त: । ज॒घान॑ । ऋ॒भु: । र॑थस्यऽइव । अङ्गा॑नि । सम् । द॒ध॒त् । परु॑षा । परु॑: ॥१२.७॥

Mantra without Swara
यदि कर्तं पतित्वा संशश्रे यदि वाश्मा प्रहृतो जघान। ऋभू रथस्येवाङ्गानि सं दधत्परुषा परुः ॥

यदि । कर्तम् । पतित्वा । सम्ऽशश्रे । यदि । वा । अश्मा । प्रऽहृत: । जघान । ऋभु: । रथस्यऽइव । अङ्गानि । सम् । दधत् । परुषा । परु: ॥१२.७॥

Meaning
१. यदि (कर्तम्) = यदि किसी छेदक आयुध ने (पतित्वा) = गिरकर (संशश्रे) = हिंसित किया है, (यदि वा) = अथवा किसी के द्वारा (अश्मा) = पाषाण [पत्थर] (प्रहृतः) = फेंका हुआ (जघान) = पुरुष को हिंसित करता है तो इस रोहणी औषध का सामर्थ्य (परु:) = पर्व को (परुषा) = दूसरे पर्व से (सन्दधत्) = संहित कर दे-फिर से घाव को ठीक करके सब पयों को ठीक से संश्लिष्ट कर दे। २. यह ओषधि सब अङ्गों को इसप्रकार संश्लिष्ट कर दे (इव) = जैसेकि (ऋभुः) = ज्ञानी शिल्पी (रथस्य अंगानि) = रथ के अंगों को संश्लिष्ट कर देता है। संश्लिष्ट [जुड़ा] हुआ रथ ठीक गतिवाला होता है, इसीप्रकार यह आहत पुरुष भी अब संश्लिष्ट-अङ्ग होकर कार्यों में शीघ्रता से गतिवाला हो।
Essence
यदि किसी आयुध या पत्थर से घाव हो गया है तो यह रोहणी ओषधि उसे ठीक कर दे। इसके प्रयोग से ठीक हुआ-हुआ शरीर-रथ अपने कार्यों में व्यास हो।
Subject
सब रथाङ्गों का ठीक होना
Special
नीरोग हुआ-हुआ यह पुरुष सब अङ्गों में शान्तिवाला हुआ-हुआ 'शन्ताति' कहलाता है। यह नीरोगता के लिए ही प्रार्थना करता हुआ कहता है -

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