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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 4/10/2

40 Sukta
7 Mantra
4/10/2
Devata- शङ्खमणिः, कृशनः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शङ्खमणि सूक्त
Mantra with Swara
यो अ॑ग्र॒तो रो॑च॒नानां॑ समु॒द्रादधि॑ जज्ञि॒षे। श॒ङ्खेन॑ ह॒त्वा रक्षां॑स्य॒त्त्रिणो॒ वि ष॑हामहे ॥

य: । अ॒ग्र॒त: । रो॒च॒नाना॑म् । स॒मु॒द्रात् । अधि॑ । ज॒ज्ञि॒षे । श॒ङ्खेन॑ । ह॒त्वा । रक्षां॑सि । अ॒त्त्रिण॑: । वि । स॒हा॒म॒हे॒ ॥१०.२॥

Mantra without Swara
यो अग्रतो रोचनानां समुद्रादधि जज्ञिषे। शङ्खेन हत्वा रक्षांस्यत्त्रिणो वि षहामहे ॥

य: । अग्रत: । रोचनानाम् । समुद्रात् । अधि । जज्ञिषे । शङ्खेन । हत्वा । रक्षांसि । अत्त्रिण: । वि । सहामहे ॥१०.२॥

Meaning
१. (य:) = जो प्रभु (रोचनानाम् अग्रत:) = देदीप्यमान पदार्थों में सर्वाग्रणी हैं, वे प्रभु (समुद्रात् अधि जज्ञिषे) = [समुद्र] प्रसन्नता युक्त मन से प्रादुर्भूत होते हैं। मनःप्रसाद होने पर हृदय में प्रभु का प्रकाश होता है। प्रभु के प्रकाश से ही सब पिण्ड चमक रहे हैं-('तस्य भासा सर्वमिदं विभाति') २. हृदय में प्रादुर्भूत हुए-हुए इस (शंखेन) = इन्द्रियों को शान्ति देनेवाले प्रभु से (रक्षांसि) = सब राक्षसी भाबों को (हत्वा) = विनष्ट करके (अत्त्रि) = हमें खा जानेवाले रोगकृमियों को भी (विषहामहे) = विशेषेण अभिभूत करते हैं। रक्षोहनन द्वारा मानस स्वास्थ्य सिद्ध होता है और अत्रि-विध्वंस द्वारा शरीर नीरोग बनता है।
Essence
प्रसन्न हृदय में उस ज्योतिर्मय प्रकाश को देखते हुए हम राक्षसी वृत्तियों का विध्वंस करके स्वस्थ मन बनें और रोगकृमियों का पराभव करते हुए हमारे शरीर स्वस्थ हों।
Subject
रक्षो हनन व अत्त्रि-पराभव

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