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Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 4/1/7

40 Sukta
7 Mantra
4/1/7
Devata- बृहस्पतिः, आदित्यः Rishi- वेनः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- ब्रह्मविद्या सूक्त
Mantra with Swara
योऽथ॑र्वाणं पि॒तरं॑ दे॒वब॑न्धुं॒ बृह॒स्पतिं॒ नम॒साव॑ च॒ गच्छा॑त्। त्वं विश्वे॑षां जनि॒ता यथासः॑ क॒विर्दे॒वो न दभा॑यत्स्व॒धावा॑न् ॥

य: । अथ॑र्वाणम् । पि॒तर॑म् । दे॒वऽब॑न्धुम् । बृह॒स्पति॑म् । नम॑सा । अव॑ । च॒ । गच्छा॑त् । त्वम् । विश्वे॑षाम् । ज॒नि॒ता । यथा॑ । अस॑: । क॒वि: । दे॒व: । न । दभा॑यत् । स्व॒धाऽवा॑न् ॥१.७॥

Mantra without Swara
योऽथर्वाणं पितरं देवबन्धुं बृहस्पतिं नमसाव च गच्छात्। त्वं विश्वेषां जनिता यथासः कविर्देवो न दभायत्स्वधावान् ॥

य: । अथर्वाणम् । पितरम् । देवऽबन्धुम् । बृहस्पतिम् । नमसा । अव । च । गच्छात् । त्वम् । विश्वेषाम् । जनिता । यथा । अस: । कवि: । देव: । न । दभायत् । स्वधाऽवान् ॥१.७॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (यः) = जो (अथर्वाणम्) = [थर्वतिचरतिका] निश्चल, कुटस्थ (पितरम्) = सबके पालक (देवबन्धुम्) = देववृत्ति के व्यक्तियों के बन्धु (च) = और (बृहस्पतिम्) = ब्रह्मणस्पति-ज्ञान के स्वामी प्रभु को (नमसा अवगच्छात्) = नमन के द्वारा जानता है। वह जानता है (यथा) = कि हे प्रभो! (त्वम्) = आप (विश्वेषां जनिता असः) = सबके प्रादुर्भूत करनेवाले हैं। उपासक नम्रता के द्वारा प्रभु को सबके उत्पादक के रूप में जान पाता है। २. यह जानता है कि (कविः) = वे प्रभु क्रान्तदर्शी हैं-सर्वज्ञ हैं, (देव:) = प्रकाशमय हैं-सबके प्रकाशित करनेवाले हैं, वे सब-कुछ देनेवाले हैं [देवो दानाद्वा दीपनाद्वा द्योतनाद्वा]। (न दभायत्) = वे प्रभु उपासक को कभी हिंसित नहीं होने देते, वासनाओं के आक्रमण से उपासक को प्रभु ही बचाते हैं, (स्व-धावान्) = प्रभु आत्मधारण शक्तिवाले हैं अथवा [स्वधा-अन्न] धारण करने के लिए सब अन्नों को प्राप्त करानेवाले हैं।
Essence
नम्नता द्वारा हम प्रभु के स्वरूप को जानने का प्रयत्न करें। इन्हें सर्वोत्पादक, सर्वज्ञ, सर्वप्रद, रक्षक व अन्नदाता के रूप में देखें। अगले सूक्त का ऋषि भी 'वेन' ही है -
Subject
नम्रता द्वारा प्रभु का ज्ञान