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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 4/1/6

40 Sukta
7 Mantra
4/1/6
Devata- बृहस्पतिः, आदित्यः Rishi- वेनः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- ब्रह्मविद्या सूक्त
Mantra with Swara
नू॒नं तद॑स्य का॒व्यो हि॑नोति म॒हो दे॒वस्य॑ पू॒र्व्यस्य॒ धाम॑। ए॒ष ज॑ज्ञे ब॒हुभिः॑ सा॒कमि॒त्था पूर्वे॒ अर्धे॒ विषि॑ते स॒सन्नु ॥

नू॒नम् । तत् । अ॒स्य॒ । का॒व्य: । हि॒नो॒ति॒ । म॒ह: । दे॒वस्य॑ । पू॒र्व्यस्य॑ । धाम॑ । ए॒ष: । ज॒ज्ञे॒ । ब॒हुऽभि॑: । सा॒कम् । इ॒त्था । पूर्वे॑ । अर्धे॑ । विऽसि॑ते स॒सन् । नु ॥१.६॥

Mantra without Swara
नूनं तदस्य काव्यो हिनोति महो देवस्य पूर्व्यस्य धाम। एष जज्ञे बहुभिः साकमित्था पूर्वे अर्धे विषिते ससन्नु ॥

नूनम् । तत् । अस्य । काव्य: । हिनोति । मह: । देवस्य । पूर्व्यस्य । धाम । एष: । जज्ञे । बहुऽभि: । साकम् । इत्था । पूर्वे । अर्धे । विऽसिते ससन् । नु ॥१.६॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (नूनम्) = निश्चय से (अस्य) = इस (पूर्व्यस) = सृष्टि से पूर्व होनेवाले [हिरण्यगर्भः समवर्तताग्ने] (महो देवस्य) = महान् देव के (तत् धाम्) = उस तेज को (काव्य:) = ज्ञानी पुरुष (हिनोति) = अपने अन्दर प्रेरित करता है। ज्ञानी सूर्योदय होते ही प्रभु के सम्पर्क में आता है और प्रभु के तेज को अपने में ग्रहण करता है। २. (इत्था) = इसप्रकार (एष:) = यह ज्ञानी (नु) = अब (ससन्) = सोता हुआ रात्रि के (पूर्वे अर्धे) = पहले आधे भाग के (विषिते) = [षोऽन्तकर्मणि, सित-finished, ended] समास होने पर (बहुभिः साकम्) = अपने परिवार के बहुत व्यक्तियों के साथ जज्ञे उदित हो उठता है। रात्रि के पिछले प्रहर में उठकर यह सपरिवार उपासना आदि कर्मों में प्रवृत्त होता है। वस्तुतः प्रभु के तेज को प्राप्त करने का यही मार्ग है।

 
Essence
ज्ञानी पुरुष प्रभु के तेज को अपने में प्रेरित करता है। इसी उद्देश्य से यह [उत्थाय पश्चिमे यामे] रात्रि के पूर्वार्द्ध में निद्रा लेकर उत्तरार्द्ध में प्रभु की उपासना के लिए उठ खड़ा होता है।
Subject
उत्थाय पश्चिमे यामे