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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 4/1/5

40 Sukta
7 Mantra
4/1/5
Devata- बृहस्पतिः, आदित्यः Rishi- वेनः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Suktam- ब्रह्मविद्या सूक्त
Mantra with Swara
स बु॒ध्न्यादा॑ष्ट्र ज॒नुषो॒ऽभ्यग्रं॒ बृह॒स्पति॑र्दे॒वता॒ तस्य॑ स॒म्राट्। अह॒र्यच्छु॒क्रं ज्योति॑षो॒ जनि॒ष्टाथ॑ द्यु॒मन्तो॒ वि व॑सन्तु॒ विप्राः॑ ॥

स: । बु॒ध्न्यात् । आ॒ष्ट्र॒ । ज॒नुष॑: । अ॒भि । अग्र॑म् । बृह॒स्पति॑: । दे॒वता॑ । तस्य॑ । स॒म्ऽराट् । अह॑: । यत् । शु॒क्रम् । ज्योति॑ष: । जनि॑ष्ट । अथ॑ । द्यु॒ऽमन्त॑: । वि । व॒स॒न्तु॒ । विप्रा॑: ॥१.५॥

Mantra without Swara
स बुध्न्यादाष्ट्र जनुषोऽभ्यग्रं बृहस्पतिर्देवता तस्य सम्राट्। अहर्यच्छुक्रं ज्योतिषो जनिष्टाथ द्युमन्तो वि वसन्तु विप्राः ॥

स: । बुध्न्यात् । आष्ट्र । जनुष: । अभि । अग्रम् । बृहस्पति: । देवता । तस्य । सम्ऽराट् । अह: । यत् । शुक्रम् । ज्योतिष: । जनिष्ट । अथ । द्युऽमन्त: । वि । वसन्तु । विप्रा: ॥१.५॥

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Meaning
१. (स:) = वे महान् प्रभु (जनुषः) = इस उत्पन्न होनेवाले संसार के (बुध्यात्) = मूल से लेकर (अग्रं, अभि) = ऊपरी भाग तक (आष्ट्र) = व्याप्त हो रहे हैं और देवता दान आदि गुणों से युक्त (बृहस्पति:) = सम्पूर्ण ज्ञान के अधिपति प्रभु (तस्य) = उस उत्पन्न लोक के (सम्राट्) = शासक हैं, २. (यत्) = जब (शुक्रम्) = यह दीप्यमान (अहः)-दिन (ज्योतिषः) = द्योतमान सूर्य से (जनिष्ट) = प्रकट होता है, (अथ) = तब (धुमन्त:) = ज्ञान की दीप्तिवाले (विप्राः) = मेघावी पुरुष (विवसन्तु) = अपने-अपने कर्मों में विविधरूप से प्रवृत्त होते हैं, अथवा हवि के द्वारा देवों का परिचरण करते हैं।
Essence
प्रभु एक सिरे से दूसरे सिरे तक सर्वत्र व्याप्त हैं। वे ही इस ब्रह्माण्ड के शासक हैं। ज्ञानी लोग सूर्योदय होते ही उस प्रभु का उपासन करते हैं और अपने कार्यों में प्रवृत्त हो जाते हैं।
Subject
सर्वव्यापक प्रभु के उपासन के साथ दिन का आरम्भ