Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 4/1/3

40 Sukta
7 Mantra
4/1/3
Devata- बृहस्पतिः, आदित्यः Rishi- वेनः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- ब्रह्मविद्या सूक्त
Mantra with Swara
प्र यो ज॒ज्ञे वि॒द्वान॑स्य॒ बन्धु॒र्विश्वा॑ दे॒वानां॒ जनि॑मा विवक्ति। ब्रह्म॒ ब्रह्म॑ण॒ उज्ज॑भार॒ मध्या॑न्नी॒चैरु॒च्चैः स्व॒धा अ॒भि प्र त॑स्थौ ॥

प्र । य: । ज॒ज्ञे । वि॒द्वान् । अ॒स्य॒ । बन्धु॑: । विश्वा॑ । दे॒वाना॑म् । जनि॑म । वि॒व॒क्ति॒ । ब्रह्म॑ । ब्रह्म॑ण: । उत् । ज॒भा॒र॒ । मध्या॑त् । नी॒चै: । उ॒च्चै: ।स्व॒धा । अ॒भि । प्र । त॒स्थौ॒ ॥१.३॥

Mantra without Swara
प्र यो जज्ञे विद्वानस्य बन्धुर्विश्वा देवानां जनिमा विवक्ति। ब्रह्म ब्रह्मण उज्जभार मध्यान्नीचैरुच्चैः स्वधा अभि प्र तस्थौ ॥

प्र । य: । जज्ञे । विद्वान् । अस्य । बन्धु: । विश्वा । देवानाम् । जनिम । विवक्ति । ब्रह्म । ब्रह्मण: । उत् । जभार । मध्यात् । नीचै: । उच्चै: ।स्वधा । अभि । प्र । तस्थौ ॥१.३॥

Meaning
१. (यः) = जो (विद्वान् प्रज)-ज्ञानी बनता है, वह (अस्य बन्धु:) = इस प्रभु का मित्र होता है अपने हृदय में प्रभु को बाँधनेवाला होता है। वह (देवानाम्) = देवों के-दिव्य गुणों के (विश्वा जनिमा) = सब जन्मों को (विवक्ति) = अपने जीवन में कहता है, अर्थात् अपने जीवन को दिव्य गुण सम्पन्न बनाता है। २. (ब्रह्मण:) = ब्रह्म से (ब्रह्म) = वेद को (उजभार) = उद्धृत करता है, अर्थात् हृदय में प्रभु का ध्यान करता हुआ यह विद्वान् ज्ञान को प्राप्त करता है और (मध्यात्) = मध्य से (नीचैः उच्चै:) = नीचे व ऊपर से-अन्तरिक्षलोक से तथा पृथिवी व धुलोक से-हदय, शरीर व मस्तिष्क से (स्वधा:) = आत्मधारण-शक्तियोंवाला यह विद्वान् (अभिप्रतस्थौ) = प्रभु की ओर प्रस्थित होता है "हृदय, शरीर व मस्तिष्क' तीनों को उन्नत करता हुआ यह प्रभु-प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ता
Essence
ज्ञानी १. प्रभु को हृदय में बाँधता है, २. दिव्य गुणयुक्त बनता है, ३. प्रभु से वेदज्ञान प्रास करने का यत्न करता है, ४. हृदय, शरीर व मस्तिष्क को उन्नत करता हुआ प्रभु की ओर बढ़ता है
Subject
ज्ञान का मार्ग

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.