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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 4/1/2

40 Sukta
7 Mantra
4/1/2
Devata- बृहस्पतिः, आदित्यः Rishi- वेनः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Suktam- ब्रह्मविद्या सूक्त
Mantra with Swara
इ॒यं पित्र्या॒ राष्ट्र्ये॒त्वग्रे॑ प्रथ॒माय॑ ज॒नुषे॑ भुवने॒ष्ठाः। तस्मा॑ ए॒तं सु॒रुचं॑ ह्वा॒रम॑ह्यं घ॒र्मं श्री॑णन्तु प्रथ॒माय॑ धा॒स्यवे॑ ॥

इ॒यम् । पित्र्या॑ । राष्ट्री॑ । ए॒तु॒ । अग्रे॑ । प्र॒थ॒माय॑ । ज॒नुषे॑ । भु॒व॒ने॒ऽस्था: । तस्मै॑ । ए॒तम् । सु॒ऽरुच॑म् । ह्वा॒रम् । अ॒ह्य॒म् । घ॒र्मम् । श्री॒ण॒न्तु॒ । प्र॒थ॒माय॑ । धा॒स्यवे॑ ॥१.२॥

Mantra without Swara
इयं पित्र्या राष्ट्र्येत्वग्रे प्रथमाय जनुषे भुवनेष्ठाः। तस्मा एतं सुरुचं ह्वारमह्यं घर्मं श्रीणन्तु प्रथमाय धास्यवे ॥

इयम् । पित्र्या । राष्ट्री । एतु । अग्रे । प्रथमाय । जनुषे । भुवनेऽस्था: । तस्मै । एतम् । सुऽरुचम् । ह्वारम् । अह्यम् । घर्मम् । श्रीणन्तु । प्रथमाय । धास्यवे ॥१.२॥

Meaning
१. (इयम्) = यह (पित्र्या) = परमपिता प्रभु से होनवाली राष्ट्री-हमारे जीवनों को दीप्त करनेवाली [राज दीसौ] (भुवनेष्ठा:) = सब लोकों में स्थित होनेवाली वेदवाणी (प्रथमाय जनुषे) = सर्वोत्कृष्ट जीवन के लिए अथवा [प्रथ विस्तारे] विस्तृत शक्तियोंवाले जीवन के लिए (अग्रे एतु) = हमें सर्वप्रथम प्राप्त हो। वेदवाणी सृष्टि के आरम्भ में प्रभु द्वारा दी जाती है। यह सब लोकों में समानरूप से प्रादुर्भूत होती है। यह हमारे जीवन को प्रकाशमय बनाती है। हमारे जीवन में इसका प्रमुख स्थान है। हम सबसे पहले इसी का स्वाध्याय करें। २. (तस्मै प्रथमाय धास्यवे) = उस सर्वमुख्य धारण करनेवाले के लिए (एतम्) = इस (धर्मम्) = यज्ञ को (श्रीणन्तु) = परिपक्व करें-संस्कृत करें। यज्ञ के द्वारा ही उस यज्ञरूप प्रभु का यजन [उपासन] होता है। यह यज्ञ (सुरुचम्) = हमारे जीवन को सम्यक् दीप्त करनेवाला है, (ह्वारम्) = क्रोध का निवारक [दया०] अथवा धूएँ के रूप में कुटिल गतिवाला है तथा (अह्याम्) = प्रतिदिन होनेवाला है [अहनि भवम्]। यज्ञ प्रतिदिन करना होता है-इसमें अनध्याय का प्रश्न ही नहीं। यह अत्यन्त बुढ़ापे या मृत्यु पर ही छटेगा। यह हमारे जीवन को दीप्त करता है तथा क्रोधादि आसुरभावों का निवारक है।
Essence
हम जीवन को उत्कृष्ट बनाने के लिए वेदवाणी का स्वाध्याय करें। वेद प्रतिपादित यज्ञों को करते हुए प्रभु को प्राप्त करें।
Subject
वेदवाणी व यज्ञ

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