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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 3/9/6

31 Sukta
6 Mantra
3/9/6
Devata- द्यावापृथिव्यौ, विश्वे देवाः Rishi- वामदेवः Chhanda- भुरिगनुष्टुप् Suktam- दुःखनाशन सूक्त
Mantra with Swara
एक॑शतं॒ विष्क॑न्धानि॒ विष्ठि॑ता पृथि॒वीमनु॑। तेषां॒ त्वामग्र॒ उज्ज॑हरुर्म॒णिं वि॑ष्कन्ध॒दूष॑णम् ॥

एक॑ऽशतम् । विऽस्क॑न्धानि । विऽस्थि॑ता । पृ॒थि॒वीम् । अनु॑ । तेषा॑म् । त्वाम् । अग्रे॑ । उत् । ज॒ह॒रु॒: । म॒णिम् । वि॒स्क॒न्ध॒ऽदूष॑णम् ॥९.६॥

Mantra without Swara
एकशतं विष्कन्धानि विष्ठिता पृथिवीमनु। तेषां त्वामग्र उज्जहरुर्मणिं विष्कन्धदूषणम् ॥

एकऽशतम् । विऽस्कन्धानि । विऽस्थिता । पृथिवीम् । अनु । तेषाम् । त्वाम् । अग्रे । उत् । जहरु: । मणिम् । विस्कन्धऽदूषणम् ॥९.६॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (एकशतम्) = एक और सौ, अर्थात् एक सौ एक (विष्कन्धानि) = विश्वभूत रोग (पृथिवीं अनु विष्ठिता) = इस शरीररूप पृथिवी में रह रहे हैं। ये रोग ही वे विघ्न हैं जो हमें उन्नति के मार्ग में आगे बढ़ने से रोकते हैं। २. (तेषां अग्रे) = उनके सामने, अर्थात् उनपर आक्रमण करने के लिए (देवा:) = देववृत्ति के ज्ञानी पुरुष (विष्कन्धदूषणम्) = रोगरूप इन सब विघ्नों को दूषित करनेवाली (त्वां मणिम्) = तुझ मणि को-वीर्यरूप मणि को (उत् जहरू:) = शरीर में ऊर्ध्व गतिवाला करते हैं। शरीर में व्याप्त हुई-हुई यह मणि सब रोगों को विशेषरूप से कम्पित करनेवाली होती है।
Essence
शरीर में वीर्य की ऊर्ध्वगति होने पर रोगरूप विघ्न कम्पित होकर दूर हो जाते हैं और उन्नति-पथ पर आगे बढ़ना सम्भव होता है।
Subject
एकशतं विष्कन्धानि
Special
वीर्य की ऊर्ध्वगति करनेवाला यह पुरुष 'अथर्वा' बनता है। यह दिन को बड़ी सुन्दरता से बिताता है। यही विषय अगले सूक्त में कहा गया है |