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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 3/9/5

31 Sukta
6 Mantra
3/9/5
Devata- द्यावापृथिव्यौ, विश्वे देवाः Rishi- वामदेवः Chhanda- चतुष्पदा निचृद्बृहती Suktam- दुःखनाशन सूक्त
Mantra with Swara
दुष्ट्यै॒ हि त्वा॑ भ॒र्त्स्यामि॑ दूषयि॒ष्यामि॑ काब॒वम्। उदा॒शवो॒ रथा॑ इव श॒पथे॑भिः सरिष्यथ ॥

दुष्ट्यै॑ । हि । त्वा॒ । भ॒त्स्यामि॑ । दू॒ष॒यि॒ष्यामि॑ । का॒ब॒वम् । उत् । आ॒शव॑: । रथा॑:ऽइव । श॒पथे॑भि: । स॒रि॒ष्य॒थ॒ ॥९.५॥

Mantra without Swara
दुष्ट्यै हि त्वा भर्त्स्यामि दूषयिष्यामि काबवम्। उदाशवो रथा इव शपथेभिः सरिष्यथ ॥

दुष्ट्यै । हि । त्वा । भत्स्यामि । दूषयिष्यामि । काबवम् । उत् । आशव: । रथा:ऽइव । शपथेभि: । सरिष्यथ ॥९.५॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे प्रभो! (दुष्ट्यै) = वासनाओं को दुषित करने के लिए (हि) = निश्चय से (त्वा) = आपको (भन्स्यामि) = अपने में बाँधूंगा-आपको हृदय में स्थिर करने का प्रयत्न करूँगा। इसप्रकार (काबवम्) = संसार के प्रति अनुराग की वृत्ति को दूषयिष्यामि-दूषित करुंगा-इसे अपने से दूर करनेवाला बनूंगा। २. प्रभु कहते हैं कि ऐसा करने पर (आशवः) = शीघ्रगामी अश्वोंवाले (रथा: इव) = रथों की भाँति तुम (शपथेभिः) = आक्रोशों से (उत् सरिष्यथ) = बाहर गतिवाले होओगे-तुम्हारा जीवन आक्रोशों से ऊपर उठ जाएगा। ('आकुष्टः कुशलं वदेत्') का पाठ पढ़कर तुम सदा आक्रोश से दूर रहोगे।
Essence
उस प्रभुरूप कवच को पहनकर हम संसार के अनुराग से ऊपर उठे, अनासक्तभाव से कर्तव्यकर्मों को करते हुए हम लोग आक्रोशों से ऊपर उठें।
Subject
शपथेभिः उत