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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 3/9/2

31 Sukta
6 Mantra
3/9/2
Devata- द्यावापृथिव्यौ, विश्वे देवाः Rishi- वामदेवः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- दुःखनाशन सूक्त
Mantra with Swara
अ॑श्रे॒ष्माणो॑ अधारय॒न्तथा॒ तन्मनु॑ना कृ॒तम्। कृ॒णोमि॒ वध्रि॒ विष्क॑न्धं मुष्काब॒र्हो गवा॑मिव ॥

अ॒श्रे॒ष्माण॑: । अ॒धा॒र॒य॒न् । तथा॑ । तत् । मनु॑ना । कृ॒तम् । कृ॒णोमि॑ । वध्रि॑ । विऽस्क॑न्धम् । मु॒ष्क॒ऽआ॒ब॒र्ह: । गवा॑म्ऽइव ॥९.२॥

Mantra without Swara
अश्रेष्माणो अधारयन्तथा तन्मनुना कृतम्। कृणोमि वध्रि विष्कन्धं मुष्काबर्हो गवामिव ॥

अश्रेष्माण: । अधारयन् । तथा । तत् । मनुना । कृतम् । कृणोमि । वध्रि । विऽस्कन्धम् । मुष्कऽआबर्ह: । गवाम्ऽइव ॥९.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (अभेष्माण:) = [श्रिष् श्रेषति to burn] ईया की अग्नि में न जलनेवाले पुरुष ही (अधारयन्) = इस जगत् का धारण करते हैं। ईर्ष्या की अग्नि में जलनेवाला पुरुष अपनी सारी शक्ति को अपने उत्थान में लगाने की बजाए दूसरों के विनाश में लगता है (तथा) = उसी प्रकार (तत्) = इस जगत् का धारण (मनुना कृतम्) = विचारशील पुरुष के द्वारा किया गया है। ईशून्य व विचारशील व्यक्ति ही जगत् का धारण करते हैं। २. ईर्ष्याशून्य व विचारशील बनकर उन्नतिपथ पर चलता हुआ मैं (किष्कन्धम्) = मार्ग में आनेवाले विघ्नों को इसप्रकार (बधि कृणोमि) = बधिया [निर्बल] कर देता हूँ, (इव) = जैसेकि (गवाम्) = बैलों के (मुष्का ) = अण्डकोशों को तोड़नेवाला उन (पुं) = गवों को निर्बल कर देता है-निवर्वीर्य कर देता है।
Essence
ईया और अविचारशीलता ही हमें आगे नहीं बढ़ने देती। इनसे दूर होकर मैं उन्नति-पथ में आनेवाले विघ्नों को निर्वीर्य कर देता हूँ।
Subject
ईया व अविचारशीलता' से दूर