Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 3/8/1

31 Sukta
6 Mantra
3/8/1
Devata- पृथिवी, वरुणः, वायुः, अग्निः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- राष्ट्रधारण सूक्त
Mantra with Swara
आ या॑तु मि॒त्र ऋ॒तुभिः॒ कल्प॑मानः संवे॒शय॑न्पृथि॒वीमु॒स्रिया॑भिः। अथा॒स्मभ्यं॒ वरु॑णो वा॒युर॒ग्निर्बृ॒हद्रा॒ष्ट्रं सं॑वे॒श्यं॑ दधातु ॥

आ । या॒तु॒ । मि॒त्र: । ऋ॒तुऽभि॑: । कल्प॑मान: । स॒म्ऽवे॒शय॑न् । पृ॒थि॒वीम् । उ॒स्रिया॑भि: । अथ॑ । अ॒स्मभ्य॑म् । वरु॑ण: । वा॒यु: । अ॒ग्नि: । बृहत् । रा॒ष्ट्रम् । स॒म्ऽवे॒श्य᳡म् । द॒धा॒तु॒ ॥८.१॥

Mantra without Swara
आ यातु मित्र ऋतुभिः कल्पमानः संवेशयन्पृथिवीमुस्रियाभिः। अथास्मभ्यं वरुणो वायुरग्निर्बृहद्राष्ट्रं संवेश्यं दधातु ॥

आ । यातु । मित्र: । ऋतुऽभि: । कल्पमान: । सम्ऽवेशयन् । पृथिवीम् । उस्रियाभि: । अथ । अस्मभ्यम् । वरुण: । वायु: । अग्नि: । बृहत् । राष्ट्रम् । सम्ऽवेश्यम् । दधातु ॥८.१॥

Meaning
१. (मित्रः) = रोगों से रक्षा करनेवाला यह सूर्य (आयातु) = हमें प्राप्त हो। (ऋतुभि:) = वसन्त आदि ऋतुओं के क्रमश: आने से (कल्पमान:) = हमारी आयु को दीर्घ करने में समर्थ होता हुआ तथा (उस्त्रियाभि:) = अपनी किरणों से (पृथिवीम्) = इस विस्तीर्ण भूमि को (संवेशयन्)-व्याप्त करता हुआ यह सूर्य आये। २. (अथ) = अब (अस्मभ्यम्) = हमारे लिए (वरुणः) = जलों का अधिष्ठातृदेव वरुण, (वायु:) = अन्तरिक्षस्थ देवों का मुखिया वायु और (अग्नि:) = पृथिवीस्थ देवों का अग्रणी यह अग्नि (संवेश्यम्) = सम्यक् अवस्थान के योग्य (बृहत्) = विशाल (राष्ट्रम्) = राष्ट्र को (दधातु) = धारण करे । सब देवों की अनुकूलता से यह राष्ट्र आधिदैविक आपत्तियों से शून्य हो।
Essence
हमारे राष्ट्र में सूर्य की किरणे पृथिवी को व्याप्त करती हुई सब ऋतुओं को ठीक से लानेवाली हौं। यहाँ वरुण, वायु व अग्निदेवों की अनुकूलता हो और हमारा राष्ट्र आधिदैविक आपत्तियों से शून्य हो।
Subject
मित्र, वरुण, वायु, अग्नि की अनुकूलता

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.