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Atharvaveda - Mantra 8

Atharvaveda 3/6/8

31 Sukta
8 Mantra
3/6/8
Devata- अश्वत्थः (वनस्पतिः) Rishi- जगद्बीजं पुरुषः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
प्रैणा॑न्नुदे॒ मन॑सा॒ प्र चि॒त्तेनो॒त ब्रह्म॑णा। प्रैणा॑न्वृ॒क्षस्य॒ शाख॑याश्व॒त्थस्य॑ नुदामहे ॥

प्र । ए॒ना॒न् । नु॒दे॒ । मन॑सा । प्र । चि॒त्तेन॑ । उ॒त । ब्रह्म॑णा । प्र । ए॒ना॒न् । वृ॒क्षस्‍य॑ । शाख॑या । अ॒श्व॒त्थस्य॑ । नु॒दा॒म॒हे॒ ॥६.८॥

Mantra without Swara
प्रैणान्नुदे मनसा प्र चित्तेनोत ब्रह्मणा। प्रैणान्वृक्षस्य शाखयाश्वत्थस्य नुदामहे ॥

प्र । एनान् । नुदे । मनसा । प्र । चित्तेन । उत । ब्रह्मणा । प्र । एनान् । वृक्षस्‍य । शाखया । अश्वत्थस्य । नुदामहे ॥६.८॥

Meaning
१. (एनान्) = इन शत्रुओं को मैं (मनसा) = मनन के द्वारा-मन से (प्रणुदे) = परे धकेल देता हूँ। जितना-जितना मन में दृढ़ निश्चय करेंगे, उतना-उतना ही इन शत्रुओं का संहार कर सकेंगे [Determination-determinus-संकल्प, सम्यक् सामर्थ्य]। (चित्तेन) = संज्ञान के द्वारा-'मैं कौन हूँ' इस बात को न भूलने के द्वारा (प्र) = मैं कामादि शत्रुओं को परे धकेलता हूँ। मैं आत्मा हूँ, परमात्मा का सखा हूँ। यह स्मरण मुझे वासनाओं में फंसने से बचाता है। (उत) = और (ब्रह्मणा) = किसी महान् लक्ष्य के द्वारा [ब्रह्म-great] व वेदज्ञान के द्वारा-वेदाध्ययन में प्रवृत्ति के द्वारा इन शत्रुओं को दूर करता हूँ। ऊँचा लक्ष्य होने पर मनुष्य इनका शिकार नहीं होता। २. हम (एनान्) = इन शत्रुओं को (अश्वत्थस्य) = कर्मशील मनुष्यों में स्थित होनेवाले (वृक्षस्य) = [वृश्चति] बन्धनों का छेदन करनेवाले प्रभु के (शाखया) = [खे शेते] हृदयाकाश में निवास के द्वारा-प्रभु को हृदयासन पर बिठाकर (प्रनुदामहे) = खूब दूर धकेलते हैं। प्रभु के हृदय में स्थित होने पर वहाँ काम आदि का होना सम्भव नहीं है।
Essence
दृढ़ निश्चय, संज्ञान, महान् लक्ष्य व हृदय में प्रभु-स्थिति के द्वारा हम शत्रुओं को परे धकेल दें।
Subject
मनसा चित्तेन ब्रह्मणा वृक्षस्य शाखया
Special
अगले सूक्त में 'क्षेत्रिय रोगों को चिकित्सा' का उल्लेख है। समचित औषध प्रयोग द्वारा रोगों को भून डालनेवाला 'भृगु' सूक्त का ऋषि है। रोग-विनाश द्वारा अङ्गों में रस का सञ्चार करता हुआ यह 'अङ्गिराः' है।

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