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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 3/6/2

31 Sukta
8 Mantra
3/6/2
Devata- अश्वत्थः (वनस्पतिः) Rishi- जगद्बीजं पुरुषः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
तान॑श्वत्थ॒ निः शृ॑णीहि॒ शत्रू॑न्वैबाध॒दोध॑तः। इन्द्रे॑ण वृत्र॒घ्ना मे॒दी मि॒त्रेण॒ वरु॑णेन च ॥

तान् । अ॒श्व॒त्थ॒: । नि: । शृ॒णी॒हि॒ । शत्रू॑न् । वै॒बा॒ध॒ऽदोध॑त: । इन्द्रे॑ण । वृ॒त्र॒ऽघ्ना । मे॒दी । मि॒त्रेण॑ । वरु॑णेन । च॒ ॥६.२॥

Mantra without Swara
तानश्वत्थ निः शृणीहि शत्रून्वैबाधदोधतः। इन्द्रेण वृत्रघ्ना मेदी मित्रेण वरुणेन च ॥

तान् । अश्वत्थ: । नि: । शृणीहि । शत्रून् । वैबाधऽदोधत: । इन्द्रेण । वृत्रऽघ्ना । मेदी । मित्रेण । वरुणेन । च ॥६.२॥

Meaning
१. हे (अश्वत्थ) = कर्मशील पुरुषों में व्याप्त होनेवाले प्रभो! आप (वैबाधदोधत:) = विशिष्ट बाधा उत्पन्न करनेवाले तथा कम्पित करनेवाले (तान्) = उन (शत्रून्) = शत्रुओं को (नि:शृणीहि) = पूर्णरूप से हिंसित कर दीजिए। ये शत्रु हमें हिंसित करनेवाले न हों। २. इन शत्रुओं से हिंसित न होकर मैं (वृत्रन:) = वासनाओं को विनष्ट करनेवाले (इन्द्रेण) = परमैश्वर्यशाली प्रभु से, (मित्रेण) = रोगों व मृत्यु से [पाप से] बचानेवाले प्रभु से (च) = और (वरुणेन) = द्वेषनिवारक प्रभु से (मेदी) = स्नेहवाला हो। प्रभु से स्नेहवाला बनने का अभिप्राय यही है कि मैं भी 'इन्द्र, मित्र और वरुण' बनें।
Essence
प्रभु मेरे पीड़ाजनक शत्रुओं को विनष्ट करें। मैं 'इन्द्र, मित्र, वरुण' नामक प्रभु से स्नेहवाला होता हुआ जितेन्द्रिय, सबके प्रति सहेवाला व निद्वेष बनूँ।
Subject
'इन्द्र, मित्र, वरुण' से स्नेहवाला

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