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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 3/6/1

31 Sukta
8 Mantra
3/6/1
Devata- अश्वत्थः (वनस्पतिः) Rishi- जगद्बीजं पुरुषः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
पुमा॑न्पुं॒सः परि॑जातोऽश्व॒त्थः ख॑दि॒रादधि॑। स ह॑न्तु॒ शत्रू॑न्माम॒कान्यान॒हं द्वेष्मि॒ ये च॒ माम् ॥

पुमा॑न् । पुं॒स: । परि॑ऽजात: । अ॒श्व॒त्थ: । ख॒दि॒रात् । अधि॑ । स: । ह॒न्तु॒ । शत्रू॑न् । मा॒म॒कान् । यान् । अ॒हम् । द्वेष्मि॑ । ये । च॒ । माम् ॥६.१॥

Mantra without Swara
पुमान्पुंसः परिजातोऽश्वत्थः खदिरादधि। स हन्तु शत्रून्मामकान्यानहं द्वेष्मि ये च माम् ॥

पुमान् । पुंस: । परिऽजात: । अश्वत्थ: । खदिरात् । अधि । स: । हन्तु । शत्रून् । मामकान् । यान् । अहम् । द्वेष्मि । ये । च । माम् ॥६.१॥

Meaning
१. प्रभु (पुमान्) = पुमान् हैं, (पुनाति) = सबको पवित्र करनेवाले हैं। (पुंस:) = अपने जीवन को पवित्र करनेवाले पुरुष से (परिजात:) = प्रादुर्भूत होते हैं। अपने हृदय को पवित्र करनेवाला पुरुष ही प्रभु के प्रकाश को देखता है। २. प्रभु'अश्वत्थ' हैं-कर्मों में व्याप्त रहनेवाले पुरुष के हृदय में स्थित होते हैं। ये प्रभु (खदिरात्) = स्थिर वृत्तिवाले-वासनाओं का संहार करनेवाले पुरुष से (अधि) = [जातः]-अपने अन्दर प्रादुर्भूत किये जाते हैं[खद स्थैर्य हिंसायां च]। ३. (स:) = वे प्रभु ही (मामकान् शत्रून) = मेरे शत्रुओं को हन्तु नष्ट करें। उन शत्रुओं को (यान्) = जिन्हें (अहम्) = मैं (द्वेष्मि) = अप्रीतिकर समझता हूँ (च) = और (ये) = जो (माम्) = मुझे द्वेष से देखते हैं। काम-क्रोध, लोभ आदि शत्रु मुझ प्रिय नहीं और मैं उनका प्रिय नहीं हूँ। प्रभु मेरे इन शत्रुओं को मुझसे पृथक् करें।
Essence
पवित्र बनकर मैं पवित्र प्रभु के प्रकाश को देखें। स्थिर वृत्तिवाला बनकर मैं कर्मशीलों में व्याप्त उस प्रभु को पहचानें। प्रभु मेरे काम आदि शत्रुओं को विनष्ट करें।
Subject
पुमान् पुंसः, अश्वत्थः खदिरात

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