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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 3/5/4

31 Sukta
8 Mantra
3/5/4
Devata- सोमः, पर्णमणिः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- राजा ओर राजकृत सूक्त
Mantra with Swara
सोम॑स्य प॒र्णः सह॑ उ॒ग्रमाग॒न्निन्द्रे॑ण द॒त्तो वरु॑णेन शि॒ष्टः। तं प्रि॑यासं ब॒हु रोच॑मानो दीर्घायु॒त्वाय॑ श॒तशा॑रदाय ॥

सोम॑स्‍य । प॒र्ण: । सह॑: । उ॒ग्रम् । आ । अ॒ग॒न् । इन्द्रे॑ण । द॒त्त: । वरु॑णेन । शि॒ष्ट: । तम् । प्रि॒या॒स॒म् । ब॒हु । रोच॑मान: । दी॒र्घा॒यु॒ऽत्वाय॑ । श॒तऽशा॑रदाय ॥५.४॥

Mantra without Swara
सोमस्य पर्णः सह उग्रमागन्निन्द्रेण दत्तो वरुणेन शिष्टः। तं प्रियासं बहु रोचमानो दीर्घायुत्वाय शतशारदाय ॥

सोमस्‍य । पर्ण: । सह: । उग्रम् । आ । अगन् । इन्द्रेण । दत्त: । वरुणेन । शिष्ट: । तम् । प्रियासम् । बहु । रोचमान: । दीर्घायुऽत्वाय । शतऽशारदाय ॥५.४॥

Meaning
१. (सोमस्य) = वीर्यशक्ति का (पर्ण:) = पालन व पूरण का कर्म (उग्रं सहः) = अत्यन्त प्रबल शत्रुनाशक सामर्थ्य को (आगन्) = प्राप्त कराता है। यह सोम का पर्ण (इन्द्रेण दत्त:) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता के द्वारा दिया जाता है, अर्थात् जितेन्द्रियता ही हमें इस सोम के पालन व पूरणरूप कर्म को प्राप्त कराती है। (वरुणेन शिष्ट:) = द्वेष का निवारण करनेवाले देव से यह अनुशष्टि होता है, अनुज्ञात होता है, अर्थात् निर्दृषता होने पर ही यह सोम शरीर में सुरक्षित रहता है। २. (तम) = उस सोम के (उग्रं सहः) = प्रबल सामर्थ्य को मैं (प्रियासम) = प्रेम करनेवाला बनें। यह सामर्थ्य मुझे प्रिय हो। इसके धारण से मैं (बहु रोचमान:) = अत्यन्त दीस बनूँ। (दीर्घायुत्वाय शतशारदाय) = मैं दीर्घजीवन के लिए-पूर्ण सौ वर्ष के जीवन को प्राप्त करने के लिए इस सोम को धारण करनेवाला बनूं।
Essence
सोम का पालनात्मक कर्म मुझे प्रबल सामर्थ्य प्राप्त कराता है। इसके धारण से मैं दीत व दीर्घजीवन प्राप्त करता हूँ।
Subject
सोम का पर्ण

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