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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 3/29/4

31 Sukta
8 Mantra
3/29/4
Devata- शितिपाद् अविः Rishi- उद्दालकः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- अवि सूक्त
Mantra with Swara
पञ्चा॑पूपं शिति॒पाद॒मविं॑ लो॒केन॒ संमि॑तम्। प्र॑दा॒तोप॑ जीवति पितॄ॒णां लो॒केऽक्षि॑तम् ॥

पञ्च॑ऽअपूपम् । शि॒ति॒ऽपाद॑म् । अवि॑म् । लो॒केन॑ । सम्ऽमि॑तम् । प्र॒ऽदा॒ता । उप॑ । जी॒व॒ति॒ । पि॒तृ॒णाम् । लो॒के । अक्षि॑तम् ॥२९.४॥

Mantra without Swara
पञ्चापूपं शितिपादमविं लोकेन संमितम्। प्रदातोप जीवति पितॄणां लोकेऽक्षितम् ॥

पञ्चऽअपूपम् । शितिऽपादम् । अविम् । लोकेन । सम्ऽमितम् । प्रऽदाता । उप । जीवति । पितृणाम् । लोके । अक्षितम् ॥२९.४॥

Meaning
१. (पञ्चापूपम्) = [पञ्च, अ, पूप-पूपी विशरणे] राष्ट्र के 'ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद'-इन पाँचों का विशीर्ण न होने देनेवाले, अथवा 'पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण व मध्य' देश के इन पाँचों भागों में रहनेवाली प्रजा को विशीर्ण न होने देनेवाले (शितिपादम्) = शुद्ध गतिवाले, विषयों में (अनासक्त अविम्) = रक्षक राजा को लोकेन संमितम-लोगों के प्रतिनिधियों से राष्ट्रसभा में निर्धारित-मानपूर्वक निश्चित किये गये कर का प्रदाता-देनेवाला प्रजावर्ग पितृणाम्-रक्षक राजपुरुषों के लोके-लोक में, अर्थात् राजपुरुषों से सुरक्षित राष्ट्र में (अक्षितम्) = अक्षीणता के साथ (उपजीवति) = जीवन धारण करता है। २. राजा का मौलिक कर्तव्य एक ही है कि वह चारों दिशाओं और मध्यभाग में स्थित सब प्रजाओं का ठीक से रक्षण करे उन्हें विशीर्ण न होने दे। राजपुरुष पितरों के समान हों। ये प्रजावर्ग को सन्तान-तुल्य समझें। प्रजा का कर्तव्य है कि वह ठीक प्रकार से कर देनेवाली हो।
Essence
राजा प्रजा का रक्षण करे। राजपुरुष पितरों के समान हों। वे अपने सन्तानरूप प्रजाओं को क्षीण न होने दें।
Subject
पितृणां लोके

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