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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 3/2/4

31 Sukta
6 Mantra
3/2/4
Devata- इन्द्रः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शत्रु सेनासंमोहन सूक्त
Mantra with Swara
व्या॑कूतय एषामि॒ताथो॑ चि॒त्तानि॑ मुह्यत। अथो॒ यद॒द्यैषां॑ हृ॒दि तदे॑षां॒ परि॒ निर्ज॑हि ॥

वि । आ॒ऽकू॒त॒य॒: । ए॒षा॒म् । इ॒त॒ । अथो॒ इति॑ । चि॒त्तानि॑ । मु॒ह्य॒त॒ । अथो॒ इति॑ । यत् । अ॒द्य । ए॒षा॒म् । हृ॒दि । तत् । ए॒षा॒म् । परि॑ । नि: । ज॒हि॒ ॥२.४॥

Mantra without Swara
व्याकूतय एषामिताथो चित्तानि मुह्यत। अथो यदद्यैषां हृदि तदेषां परि निर्जहि ॥

वि । आऽकूतय: । एषाम् । इत । अथो इति । चित्तानि । मुह्यत । अथो इति । यत् । अद्य । एषाम् । हृदि । तत् । एषाम् । परि । नि: । जहि ॥२.४॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार ये शत्रु ऐसे घबरा जाएँ कि हे (व्याकृतयः) = बिरुद्ध संकल्पो! तुम (एषाम्) = इन शत्रुओं के मनों को (इत) = प्राप्त होओ। शत्रुपक्ष का कोई व्यक्ति कुछ कहे और कोई कुछ। उनमें मतैक्य न हो। (अथ उ) = और अब (चित्तानि) = हे शत्रुओं के चित्तो! (मुहात) = तुम भी किंकर्तव्यमूढ़ हो जाओ। इनके चित्त इसप्रकार व्याकुल हो जाएँ कि ये कुछ समझ ही न सकें ये किसी निश्चय पर न पहुँच सकें। २. हे इन्द्र! तू इनपर इसप्रकार प्रबल आक्रमण कर कि (अथ उ) = अब निश्चय से (यत्) = जो (अद्य) = आज (एषां हदि) = इनके हृदय में हो (एषाम्) = इनके (तत्) = उस संकल्प को (परिनिर्जहि) = सर्वथा नष्ट कर दे। ये ऐसे घबरा जाएँ कि अपने सारे संकल्पों को भूलकर ये अपने जीवन को बचाने के लिए भाग खड़े हों।
Essence
सेनापति शत्रुओं पर ऐसा प्रबल आक्रमण करे कि उनके युद्ध-विषयक सब संकल्प विलीन हो जाएँ।
Subject
शत्रु-संकल्प-विनाश