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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 3/19/2

31 Sukta
8 Mantra
3/19/2
Devata- विश्वेदेवाः, चन्द्रमाः, इन्द्रः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- अजरक्षत्र
Mantra with Swara
सम॒हमे॒षां रा॒ष्ट्रं स्या॑मि॒ समोजो॑ वी॒र्यं बल॑म्। वृ॒श्चामि॒ शत्रू॑णां बा॒हून॒नेन॑ ह॒विषा॒हम् ॥

सम् । अ॒हम् । ए॒षाम् । रा॒ष्ट्रम् । स्या॒मि॒ । सम् । ओज॑: । वी॒र्य᳡म् । बल॑म् । वृ॒श्चामि॑ । शत्रू॑णाम् । बा॒हून् । अ॒नेन॑ । ह॒विषा॑ । अ॒हम् ॥१९.२॥

Mantra without Swara
समहमेषां राष्ट्रं स्यामि समोजो वीर्यं बलम्। वृश्चामि शत्रूणां बाहूननेन हविषाहम् ॥

सम् । अहम् । एषाम् । राष्ट्रम् । स्यामि । सम् । ओज: । वीर्यम् । बलम् । वृश्चामि । शत्रूणाम् । बाहून् । अनेन । हविषा । अहम् ॥१९.२॥

Meaning
१. (अहम्) = मैं (एषाम्) = इनके (राष्ट्रम्) = राष्ट्र को (संस्थामी) = सम्यक् तीक्ष्ण करता हूँ। (ओजः) = इनके ओज को-मानस बल को (सम्) [स्यामि] = तीक्ष्ण करता हूँ और (वीर्यम्) = इनके प्राणमयकोश को वीर्यवान् बनता हूँ, (बलम्) = इनकी शत्रुनाशक शक्ति को भी तीक्ष्ण करता हूँ। २. (अनेन हविषा) = इस हवि के द्वारा-देकर बचे हुए को खाने की वृत्ति के द्वारा-त्याग के द्वारा (अहम्) = मैं (शत्रूणां बाहून्) = शत्रुओं की बाहुओं को (वृश्चामि) = काट डालता हूँ। वस्तुत: जब राष्ट्र में त्याग की वृत्ति आ जाती है तब राष्ट्रीय शक्ति इनती बढ़ जाती है कि राष्ट्र के शत्रु छिन्न-भुज हो जाते हैं, हमारे राष्ट्र पर आक्रमण करने का उसका साहस जाता रहता है।

 
Essence
पुरोहित को राष्ट्र को तेजस्वी बनाना है, राष्ट्र की शक्ति का वर्धन करना है, प्रजा में राष्ट्र के लिए त्याग की भावना पैदा करके शत्रुओं को छिन्न-भुज सा कर डालना है |
Subject
त्यागवृत्ति द्वारा शत्रुभुज-छेदन

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