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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 3/18/6

31 Sukta
6 Mantra
3/18/6
Devata- वनस्पतिः Rishi- अथर्वा Chhanda- उष्णिग्गर्भापथ्यापङ्क्तिः Suktam- वनस्पति
Mantra with Swara
अ॒भि ते॑ऽधां॒ सह॑माना॒मुप॑ तेऽधां॒ सही॑यसीम्। मामनु॒ प्र ते॒ मनो॑ व॒त्सं गौरि॑व धावतु प॒था वारि॑व धावतु ॥

अ॒भि । ते॒ । अ॒धा॒म् । सह॑मानाम् । उप॑ । ते॒ । अ॒धा॒म् । सही॑यसीम् । माम् । अनु॑ । प्र । ते॒ । मन॑: । व॒त्सम् । गौ:ऽइ॑व । धा॒व॒तु॒ । प॒था । वा:ऽइ॑व । धा॒व॒तु॒ ॥१८.६॥

Mantra without Swara
अभि तेऽधां सहमानामुप तेऽधां सहीयसीम्। मामनु प्र ते मनो वत्सं गौरिव धावतु पथा वारिव धावतु ॥

अभि । ते । अधाम् । सहमानाम् । उप । ते । अधाम् । सहीयसीम् । माम् । अनु । प्र । ते । मन: । वत्सम् । गौ:ऽइव । धावतु । पथा । वा:ऽइव । धावतु ॥१८.६॥

Meaning
१. प्रभु जीव से कहते हैं कि मैं (ते) = तेरे लिए इस (सहमानाम्) = शत्रुओं का पराभव करनेवाली ब्रह्मविद्या [आत्मविद्या] को (अभि अधाम्) = धारण करता हूँ। इस (सहीयसीम्) = शत्रुओं का खूब ही पराभव करनेवाली ब्रह्मविद्या को (ते अप अधाम्) = तेरे समीप स्थापित करता हूँ। २. इस आत्मविद्या द्वारा शत्रुओं का पराभव होने पर (माम् अनु) = मेरे पीछे-मेरा लक्ष्य करके (ते मन:) = तेरा मन इसप्रकार (प्रधावतु) = दौड़े, (इव) = जैसेकि (वत्सं गौ:) = बछड़े का लक्ष्य करके गौ जाती है, अथवा (इव) = जैसे (पथा) - निम्नमार्ग से (वा:) = जल (धावत) = दौड़ता है। जल स्वभावत: निम्न मार्ग से जाता है, उसी प्रकार हमारा मन स्वभावतः प्रभु की ओर जानेवाला हो।
Essence
आत्मविद्या प्राप्त करके हम शत्रुओं को कुचल डालें और हमारा मन प्रभु की ओर गतिवाला हो, उसी प्रकार प्रभु की ओर गतिवाला हो, जैसे गौ बछड़े की ओर गतिवाली होती है।
Subject
वत्सं गौ इव
Special
आत्मविद्या द्वारा शत्रुओं को पराभूत करके यह व्यक्ति वशिष्ठ' बनता है, वशियों में श्रेष्ठ[वशिष्ठ] अथवा सर्वोतम निवासवाला [वस् निवासे]। यह प्रार्थना करता है कि -

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