Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 3/18/4

31 Sukta
6 Mantra
3/18/4
Devata- वनस्पतिः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुब्गर्भाचतुष्पादुष्णिक् Suktam- वनस्पति
Mantra with Swara
उत्त॑रा॒हमु॑त्तर॒ उत्त॒रेदुत्त॑राभ्यः। अ॒धः स॒पत्नी॒ या ममाध॑रा॒ साध॑राभ्यः ॥

उत्ऽत॑रा । अ॒हम् । उ॒त्ऽत॒रे॒ । उत्ऽत॑रा । इत् । उत्ऽत॑राभ्य: । अ॒ध: । स॒ऽपत्नी॑ । या । मम॑ । अध॑रा । सा । अध॑राभ्य: ॥१८.४॥

Mantra without Swara
उत्तराहमुत्तर उत्तरेदुत्तराभ्यः। अधः सपत्नी या ममाधरा साधराभ्यः ॥

उत्ऽतरा । अहम् । उत्ऽतरे । उत्ऽतरा । इत् । उत्ऽतराभ्य: । अध: । सऽपत्नी । या । मम । अधरा । सा । अधराभ्य: ॥१८.४॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. हे (उत्तरे) = उत्कृष्ट आत्मविद्ये! तुझे प्राप्त करके (अहम्, उत्तरा) = मैं भी उत्कृष्ट जीवनवाली बनती हैं। मैं (इत) = निश्चय से (उत्तराभ्यः उत्तरा) = उत्कृष्टकतरों से भी उत्कृष्टतर होती हूँ। वस्तुत: आत्मविद्या के प्राप्त होने पर जीवन में किसी प्रकार की अवनति स्थान नहीं पाती। जीवन अधिकाधिक उत्कृष्ट बनता जाता है। ३. इन्द्राणी कहती है कि (अध:) = इस आत्मविद्या के परिणामस्वरूप (या मम) = जो यह मेरी (सपत्नी) = भोगवृत्तिरूपी सपत्नी है, (सा) = वह (अधराभ्यः अधरा) = निकृष्ट स्थितिवालों से भी निकृष्टतर स्थितिवाली हो जाती है। वह तो पाँव तले रौंद डाली जाती है। भोगवृत्ति को कुचलकर मैं योगवृत्ति में शरण लेती हूँ।
Essence
आत्मविद्या प्राप्त करके 'इन्द्राणी' की उत्कृष्टतम स्थिति होती है और 'भोगवत्ति' की निकृष्टतम, भोगवृत्ति तो कुचल दी जाती है।
Subject
उत्तराभ्यः उत्तरा-इन्द्राणी, अधराभ्यः अधरा-भोगवृत्ति