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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 3/18/2

31 Sukta
6 Mantra
3/18/2
Devata- वनस्पतिः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वनस्पति
Mantra with Swara
उत्ता॑नपर्णे॒ सुभ॑गे॒ देव॑जूते॒ सह॑स्वति। स॒पत्नीं॑ मे॒ परा॑ णुद॒ पतिं॑ मे॒ केव॑लं कृधि ॥

उत्ता॑नऽपर्णे । सुऽभ॑गे । देव॑ऽजूते । सह॑स्वति । स॒ऽपत्नी॑म् । मे॒ । परा॑ । नु॒द॒ । पति॑म् । मे॒ । केव॑लम् । कृ॒धि॒ ॥१८.२॥

Mantra without Swara
उत्तानपर्णे सुभगे देवजूते सहस्वति। सपत्नीं मे परा णुद पतिं मे केवलं कृधि ॥

उत्तानऽपर्णे । सुऽभगे । देवऽजूते । सहस्वति । सऽपत्नीम् । मे । परा । नुद । पतिम् । मे । केवलम् । कृधि ॥१८.२॥

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Meaning
१. आत्मविद्या 'अत्तानपर्णा' है-ऊर्ध्वमुख पोवाली है-हमें सदा उन्नति की ओर ले चलनेवाली तथा हमारा पालन व पुरण करनेवाली है। 'सुभगा'-उत्तम ज्ञान व अनासक्ति को उत्पन्न करनेवाली है [भग:-ज्ञान, वैराग्य]। यह 'देवता' है-विद्वानों द्वारा हममें प्रेरित होती है। यह आत्मविद्या 'सहस्वती'-काम-क्रोध आदि शत्रुओं को कुचल देनेवाले बल को उत्पन्न करती है। हे (उत्तानपर्ण, सुभगे, देवजूते, सहस्वति) = आत्मविद्ये! तू (मे) = मेरे अन्दर रहनेवाली इस (सपत्नी) = इन्द्राणी की सपत्नीभूत भोगवृत्ति को (परानुद) = दूर कर दे। २. एवं, आत्मविद्या के द्वारा भोगवृत्ति से ऊपर उठा हुआ पुरुष यही प्रार्थना करता है कि उस (के-वलम्) = आनन्द में विचरनेवाले (पत्तिम्) = सर्वरक्षक प्रभु को मे (कृधि) = मेरा कर । मैं प्रभु-प्राप्ति की ही कामनावाला बनें।
Essence
आत्मविद्या हमें उन्नत करती है, हममें शत्रुओं का मर्षक बल पैदा करती है और हमें प्रभु में रमणवाला बनाती है।
Subject
उत्तानपणा-सहस्वती