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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 3/15/6

31 Sukta
8 Mantra
3/15/6
Devata- धनम्, धनरुचिः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- वाणिज्य
Mantra with Swara
येन॒ धने॑न प्रप॒णं चरा॑मि॒ धने॑न देवा॒ धन॑मि॒च्छमा॑नः। तस्मि॑न्म॒ इन्द्रो॒ रुचि॒मा द॑धातु प्र॒जाप॑तिः सवि॒ता सोमो॑ अ॒ग्निः ॥

येन॑ । धने॑न । प्र॒ऽप॒णम् । चरा॑मि । धने॑न । दे॒वा॒: । धन॑म् । इ॒च्छमा॑न: । तस्मि॑न् । मे॒ । इन्द्र॑: । रुचि॑म् । आ । द॒धा॒तु॒ । प्र॒जाऽप॑ति: । स॒वि॒ता । सोम॑:। अ॒ग्नि: ॥१५.६॥

Mantra without Swara
येन धनेन प्रपणं चरामि धनेन देवा धनमिच्छमानः। तस्मिन्म इन्द्रो रुचिमा दधातु प्रजापतिः सविता सोमो अग्निः ॥

येन । धनेन । प्रऽपणम् । चरामि । धनेन । देवा: । धनम् । इच्छमान: । तस्मिन् । मे । इन्द्र: । रुचिम् । आ । दधातु । प्रजाऽपति: । सविता । सोम:। अग्नि: ॥१५.६॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (येन) = जिस (धनेन) = मूलधन से (प्रपणम् चरामि) = क्रय करता हूँ, हे (दवा:) = व्यवहारसाधक देवो! इस (धनेन) = धन से (धनम् इच्छमान:) = वृद्धियुक्त धन को चाहता हुआ मैं ऐसा करता हूँ। २. (तस्मिन्) = उस व्यवहार में (इन्द्र:) = जितेन्द्रियता की देवता मे मेरी (रुचिम्) = रुचि को (आदधातु) = धारण करे, जितेन्द्रिय बनकर मैं उस व्यापार को रुचि से करूँ । (प्रजापतिः) = प्रजा का रक्षक देव, अर्थात प्रजा के सन्तान के पालन की भावना मुझे उसमें रुचिवाला करे। इसीप्रकार (सविता) = निर्माण की भावना, (सोमः) = सौम्यता का भाव और (अग्नि:) = प्रगति की भावना मुझे उसमें रुचिवाला करे । 'सोमः' शब्द सौम्यता का प्रतिपादन करता हुआ यह स्पष्ट कर रहा है कि एक व्यापारी को अवश्य सौम्य स्वभाव का बनना है, उन स्वभाव नहीं।
Essence
मैं जितेन्द्रिय, सन्तान के रक्षण की भावनावाला, निर्माता, सौम्य व प्रगतिवाला बनकर अपने व्यापार को रुचि से करूँ।
Subject
इन्द्रः, प्रजापतिः, सविता, सोमः, अग्निः