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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 3/14/5

31 Sukta
6 Mantra
3/14/5
Devata- गौः, गोष्ठः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- गोष्ठ सूक्त
Mantra with Swara
शि॒वो वो॑ गो॒ष्ठो भ॑वतु शारि॒शाके॑व पुष्यत। इ॒हैवोत प्र जा॑यध्वं॒ मया॑ वः॒ सं सृ॑जामसि ॥

शि॒व: । व॒: । गो॒ऽस्थ: । भ॒व॒तु॒ । शा॒रि॒शाका॑ऽइव । पु॒ष्य॒त॒ । इ॒ह । ए॒व । उ॒त । प्र । जा॒य॒ध्व॒म् । मया॑ । व॒: । सम् । सृ॒जा॒म॒सि॒ ॥१४.५॥

Mantra without Swara
शिवो वो गोष्ठो भवतु शारिशाकेव पुष्यत। इहैवोत प्र जायध्वं मया वः सं सृजामसि ॥

शिव: । व: । गोऽस्थ: । भवतु । शारिशाकाऽइव । पुष्यत । इह । एव । उत । प्र । जायध्वम् । मया । व: । सम् । सृजामसि ॥१४.५॥

Meaning
१. हे गौओ! (गोष्ठ:) = यह गोशाला (व:) = तुम्हारे लिए (शिवः भवतु) = कल्याणकर हो। इसमें स्थित हुई-हुई तुम (शारिशाका इव) = शालिधान्य की शक्ति की भाँति (पुष्यत) = हमारा पोषण करनेवाली होओ। जैसे यह धान्य हमारे रोगों को शीर्ण करता हुआ हमारी शक्ति का वर्धन करता है, उसी प्रकार ये गौएँ अपने दूध से हमारा पोषण करें। २. (उत) = और हे गौओ! (इह एव) = यहाँ ही (प्रजायध्यम) = सन्तानों से वृद्धि को प्राप्त होओ। हम (मया) = अपने साथ (व:) = तुम्हें (संसृजामसि) = संसृष्ट करते हैं।
Essence
गौओं के लिए गोष्ठ सुखद हो। इस गोष्ठ में स्थित गौएँ शालिधान्य की शक्ति की भाँति हमें शक्ति प्राप्त करानेवाली हों। इन बढ़ती हुई गौओं का हमारे साथ सम्बन्ध हो।
Subject
शिवः गोष्ठः

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