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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 3/14/2

31 Sukta
6 Mantra
3/14/2
Devata- गोष्ठः, अहः, अर्यमा, पूषा, बृहस्पतिः, इन्द्रः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- गोष्ठ सूक्त
Mantra with Swara
सं वः॑ सृजत्वर्य॒मा सं पू॒षा सं बृह॒स्पतिः॑। समिन्द्रो॒ यो ध॑नंज॒यो मयि॑ पुष्यत॒ यद्वसु॑ ॥

सम् । व॒: । सृ॒ज॒तु॒ । अ॒र्य॒मा । सम् । पू॒षा । सम् । बृह॒स्पति॑: । सम् । इन्द्र॑: । य: । ध॒न॒म्ऽज॒य: । मयि॑ । पु॒ष्य॒त॒ । यत् । वसु॑ ॥१४.२॥

Mantra without Swara
सं वः सृजत्वर्यमा सं पूषा सं बृहस्पतिः। समिन्द्रो यो धनंजयो मयि पुष्यत यद्वसु ॥

सम् । व: । सृजतु । अर्यमा । सम् । पूषा । सम् । बृहस्पति: । सम् । इन्द्र: । य: । धनम्ऽजय: । मयि । पुष्यत । यत् । वसु ॥१४.२॥

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Meaning
१. हे गौओ! (अर्यमा) = काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नियमन करनेवाला (वः) = तुम्हें (संसृजतु) = अपने साथ संसृष्ट करे। गोदुग्ध के प्रयोग से सात्त्विक वृत्तिवाला बनकर यह काम, क्रोध आदि को वश में करनेवाला बनता है। (पूषा) = अपना पोषण करनेवाला (सम्) = इन गौओं को अपने साथ संसृष्ट करे। गोदुग्ध शरीर का उत्तम पोषण करनेवाला है। (बृहस्पति:) =  ज्ञानियों का भी ज्ञानी (सम्) = तुम्हें अपने साथ जोड़े। गोदुग्ध से सात्विक बुद्धि होती है। इसप्रकार यह गोदुग्ध हमें शरीर के दृष्टिकोण से 'पूषा', मन के दृष्टिकोण से 'अर्यमा' व मस्तिष्क के दृष्टिकोण से बृहस्पति बनता है। २. (यः) = जो (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष (धनञ्जयः) = धनों का विजय करनेवाला है वह (सम्) = इन गौओं को अपने साथ संसृष्ट करे, अर्थात् गोदुग्ध हमें 'धनञ्जय इन्द्र' बनने में सहायक होता है। हे गौओ! तुम (यत् वसु) = जो भी वसु है, निवास के लिए आवश्यक धन है, उसे (मयि पुष्यत) = मुझमें पोषित करो। गोदुग्ध मुझे सब वसुओं को प्राप्त करानेवाला हो।
Essence
गोदुग्ध का प्रयोग हमें 'अर्यमा, पूषा, बृहस्पति व इन्द्र' बनाता है। यह हमारे जीवन में वसुओं का पोषण करता है। गौ को अर्थवेद ७.७३.८ में 'वसुपत्नी वसूनाम्' कहा गया है।
Subject
'अर्यमा, पूषा, बृहस्पति, इन्द्र'