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Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 3/13/7

31 Sukta
7 Mantra
3/13/7
Devata- वरुणः, सिन्धुः, आपः Rishi- भृगुः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- आपो देवता सूक्त
Mantra with Swara
इ॒दं व॑ आपो॒ हृद॑यम॒यं व॒त्स ऋ॑तावरीः। इ॒हेत्थमेत॑ शक्वरी॒र्यत्रे॒दं वे॒शया॑मि वः ॥

इ॒दम् । व॒: । आ॒प॒: । हृद॑यम् । अ॒यम् । व॒त्स: । ऋ॒त॒ऽव॒री॒: । इ॒ह । इ॒त्थम् । आ । इ॒त॒ । श॒क्व॒री॒: । यत्र॑ । इ॒दम् । वे॒शया॑मि । व॒: ॥१३.७॥

Mantra without Swara
इदं व आपो हृदयमयं वत्स ऋतावरीः। इहेत्थमेत शक्वरीर्यत्रेदं वेशयामि वः ॥

इदम् । व: । आप: । हृदयम् । अयम् । वत्स: । ऋतऽवरी: । इह । इत्थम् । आ । इत । शक्वरी: । यत्र । इदम् । वेशयामि । व: ॥१३.७॥

Meaning
१. हे (आप:) = जलो! (इदं हृदयम्) = यह मेरा हृदय (वः) = आपका है। मैं हृदय में आपके महत्त्व को समझता हूँ। हे (ऋतावरी:) = सत्य व यज्ञ आदि ऋतोंवाले जलो! (अयम्) = यह मैं (वत्स:) = आपका प्रिय हूँ। जलों के महत्त्व को समझनेवाला यह पुरुष जल-प्रिय बन जाता है। २. हे (शक्वरी:) = शक्ति देनेवाले जलो! (इह) = यहाँ-हमारे शरीर में (इत्थम्) = इसप्रकार ही (एत) = प्राप्त होओ, अर्थात् शरीर में प्रविष्ट होकर तुम शक्ति देनेवाले होओ। (यत्र) = जहाँ शरीर में (इदम्) = [इदानीम्] अब मैं (व:) = आपको (वेशयामि) = प्रवेश कराता हूँ, वहाँ आप शरीर में शक्ति देनेवाले होओ और मन में ऋत का स्थापन करो।
Essence
ठीक प्रकार से विनियुक्त हुए-हुए जल हमारे शरीरों को शक्तिशाली बनाएँ और हृदयों को ऋत [सत्य व यज्ञ] से युक्त करें।
Subject
ऋतावरी+शक्वरी
Special
अगले सूक्त का विषय 'गोष्ठ' है। गोष्ठवाला व्यक्ति ही 'ब्रह्मा' बनता है। ब्रह्मा बनने के लिए गोपालन आवश्यक है। गौओं का मानव जीवन के निर्माण में महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनके दूध का प्रयोग करनेवाला व्यक्ति, 'नीरोग, निर्मल व दीप्स' बनता है। उन्नत होता हुआ यह 'ब्रह्मा' [great] बन जाता है। यही इस सूक्त का ऋषि है।

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