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Atharvaveda - Mantra 8

Atharvaveda 3/11/8

31 Sukta
8 Mantra
3/11/8
Devata- इन्द्राग्नी, आयुः, यक्ष्मनाशनम् Rishi- ब्रह्मा, भृग्वङ्गिराः Chhanda- त्र्यवसाना षट्पदा बृहतीगर्भा जगती Suktam- दीर्घायुप्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
अ॒भि त्वा॑ जरि॒माहि॑त॒ गामु॒क्षण॑मिव॒ रज्ज्वा॑। यस्त्वा॑ मृ॒त्युर॒भ्यध॑त्त॒ जाय॑मानं सुपा॒शया॑। तं ते॑ स॒त्यस्य॒ हस्ता॑भ्या॒मुद॑मुञ्च॒द्बृह॒स्पतिः॑ ॥

अ॒भि । त्वा॒ । ज॒रि॒मा । अ॒हि॒त । गाम् । उ॒क्षण॑म्ऽइव । रज्ज्वा॑ । य: । त्वा॒ । मृ॒त्यु: । अ॒भि॒ऽअध॑त्त । जाय॑मानम् । सु॒ऽपा॒शया॑ । तम् । ते॒ । स॒त्यस्य॑ । हस्ता॑भ्याम् । उत् । अ॒मु॒ञ्च॒त् । बृह॒स्पति॑: ॥११.८॥

Mantra without Swara
अभि त्वा जरिमाहित गामुक्षणमिव रज्ज्वा। यस्त्वा मृत्युरभ्यधत्त जायमानं सुपाशया। तं ते सत्यस्य हस्ताभ्यामुदमुञ्चद्बृहस्पतिः ॥

अभि । त्वा । जरिमा । अहित । गाम् । उक्षणम्ऽइव । रज्ज्वा । य: । त्वा । मृत्यु: । अभिऽअधत्त । जायमानम् । सुऽपाशया । तम् । ते । सत्यस्य । हस्ताभ्याम् । उत् । अमुञ्चत् । बृहस्पति: ॥११.८॥

Meaning
१. हे जीव! (इव) = जैसे (उक्षणं गाम्) = शक्ति का सेचन करनेवाले वृषभ को (रज्ज्वा) = रस्सी से बाँधते हैं, इसीप्रकार (त्वा) = तुझे (जरिमा) = यह जरा (अभि, अहित) = बाँधती है। (जायमानम्) = उत्पन्न होते हुए ही (त्वा) = तुझे (यः मृत्युः) = जो मृत्यु (सुपाशया) = दृढ़ पाश से (अभ्यधत्त) = बाँधती है, (सत्यस्य हस्ताभ्याम्) = सत्य के हाथों के द्वारा (ते) = तेरी (तम्) = उस मृत्यु को (बृहस्पति:) = ज्ञान की देवता (उदमुञ्चत्) = छुड़ा देता है। २. मनुष्य उत्पन्न होते ही मृत्यु के बन्धन में बद्ध हो जाता है। सत्य का व्यवहार इसे मृत्यु के बन्धन से छुड़ाता है।
Essence
सत्य का व्यवहार दीर्घजीवन का कारण है।
Subject
सत्यव्यवहार से मृत्युबन्धनमुक्ति
Special
अग्निहोत्र आदि साधनों से दीर्घजीवन प्राप्त करनेवाला यह 'ब्रा' बनता है। यह उत्तम घर का निर्माण करता है। इस घर का वर्णन ही अगले सूक्त में है -

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