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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 3/1/2

31 Sukta
6 Mantra
3/1/2
Devata- मरुद्गणः Rishi- अथर्वा Chhanda- विराड्गर्भा भुरिक्त्रिष्टुप् Suktam- शत्रु सेनासंमोहन सूक्त
Mantra with Swara
यू॒यमु॒ग्रा म॑रुत ई॒दृशे॑ स्था॒भि प्रेत॑ मृ॒णत॒ सह॑ध्वम्। अमी॑मृण॒न्वस॑वो नाथि॒ता इ॒मे अ॒ग्निर्ह्ये॑षां दू॒तः प्र॒त्येतु॑ वि॒द्वान् ॥

यू॒यम् । उ॒ग्रा: । म॒रु॒त॒: । ई॒दृशे॑ । स्थ॒ । अ॒भि । प्र । इ॒त॒ । मृ॒णत॑ । सह॑ध्वम् । अमी॑मृणन् । वस॑व: । ना॒थि॒ता: । इ॒मे । अ॒ग्नि: । हि । ए॒षा॒म् । दू॒त: । प्र॒ति॒ऽएतु॑ । वि॒द्वान् ॥१.२॥

Mantra without Swara
यूयमुग्रा मरुत ईदृशे स्थाभि प्रेत मृणत सहध्वम्। अमीमृणन्वसवो नाथिता इमे अग्निर्ह्येषां दूतः प्रत्येतु विद्वान् ॥

यूयम् । उग्रा: । मरुत: । ईदृशे । स्थ । अभि । प्र । इत । मृणत । सहध्वम् । अमीमृणन् । वसव: । नाथिता: । इमे । अग्नि: । हि । एषाम् । दूत: । प्रतिऽएतु । विद्वान् ॥१.२॥

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Meaning
१. राजा सैनिकों से कहता है कि हे (मरुत:) = [नियन्ते न निवर्तन्ते] युद्ध में पीठ न दिखानेवाले वीरो! (ईदृशे) = ऐसी अव्यवस्था में जबकि शत्रु का भयंकर संकट उपस्थित है (यूयम) = तुम सब (उना:) = तेजस्वी (स्थ) = बनो। (अभिप्रेत) = शत्रु की ओर प्रकर्षण बढ़ो, (मृणत) = शत्रु सैन्य को मसल डालो, (सहध्वम्) = उसे पराजित करनेवाले होओ। २. (नाथिता:) = राजा से इसप्रकार कहे हुए [नाथ-to beg, to ask for] (इमे) = ये (वसव:) = प्रजाओं के निवास को उत्तम बनानेवाले वीर (अमीमृणन्) = सब ओर शत्रुओं को मसल डालते हैं। शत्रुओं को विनष्ट करके ही तो ये प्रजाओं के जीवन को सुखी बना पाएंगे। (एषाम्) = इन सैनिकों का (अग्निः) = नेतृत्व करनेवाला राजा (हि) = निश्चय से (विद्वान्) = शत्रुओं की गतिविधियों से पूर्ण परिचित होता हुआ (दूतः) = शत्रुओं को सन्तप्त करनेवाला होकर (प्रति एतु) = शत्रु-सैन्य की ओर जानेवाला हो।
Essence
राजा सैनिकों को उत्साहित करे। वीर-प्ररेणा को प्राप्त सैनिक शत्रुओं को पराजित करनेवाले हों, राजा स्वयं सेनाओं का नेतृत्व करे और प्रबल आक्रमण द्वारा शत्रुओं को समास कर दे।
Subject
वीर-प्रेरणा