Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 2/8/5

36 Sukta
5 Mantra
2/8/5
Devata- वनस्पतिः, यक्ष्मनाशनम् Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- निचृत्पथ्यापङ्क्तिः Suktam- क्षेत्रियरोगनाशन
Mantra with Swara
नमः॑ सनिस्रसा॒क्षेभ्यो॒ नमः॑ संदे॒श्ये॑भ्यः। नमः॒ क्षेत्र॑स्य॒ पत॑ये वी॒रुत्क्षे॑त्रिय॒नाश॒न्यप॑ क्षेत्रि॒यमु॑च्छतु ॥

नम॑: । स॒नि॒स्र॒स॒ऽअ॒क्षेभ्य॑: । नम॑: । स॒म्ऽदे॒श्ये᳡भ्य: । नम॑: । क्षेत्र॑स्य । पत॑ये । वी॒रुत् । क्षे॒त्रि॒य॒ऽनाश॑नी । अप॑ । क्षे॒त्रि॒यम् । उ॒च्छ॒तु॒ ॥८.५॥

Mantra without Swara
नमः सनिस्रसाक्षेभ्यो नमः संदेश्येभ्यः। नमः क्षेत्रस्य पतये वीरुत्क्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमुच्छतु ॥

नम: । सनिस्रसऽअक्षेभ्य: । नम: । सम्ऽदेश्येभ्य: । नम: । क्षेत्रस्य । पतये । वीरुत् । क्षेत्रियऽनाशनी । अप । क्षेत्रियम् । उच्छतु ॥८.५॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. (सनिस्त्रसाक्षेभ्यः)  = [संस्-Togo. अक्ष-Axle-pole या कार] खुब गतिशील अक्षदण्ड या गतिशील गाड़ियों के लिए, जिनमें कृषि से उत्पन्न सामान को इधर-उधर ले-जाते हैं, (नमः) = नमस्कार हो । (सन्देश्येभ्य:) = इन अन्नों के सन्देशवाहकों के लिए-इन औषध-द्रव्यों के गुणों का प्रचार करनेवालों के लिए (नम:) = नमस्कार हो। (क्षेत्रस्य पतये) = क्षेत्र के पति के लिए, जो इन ओषधियों को उत्पन्न करता है, (नमः) = नमस्कार हो। २. इसप्रकार उत्पन्न की गई, यथास्थान पहुँचाई गई और जिनके गुणों का ज्ञान दिया गया है, वह (क्षेत्रियनाशनी) = क्षेत्रिय रोग को नष्ट करनेवाली (वीरुत्) = लता (क्षेत्रियम्) = क्षेत्रियरोग को (अप उच्छतु) = नष्ट करनेवाली हो।
Essence
क्षेत्रपति को उचित आदर देना है, उसकी गाड़ियों को ठीक रखना है। औषध द्रव्यों के गुणों का सन्देश देनेवालों के लिए भी उचित आदर हो।
Subject
सनिस्त्रसाक्ष, सन्देश्य, क्षेत्रपति
Special
सूक्त के आरम्भ में क्षेत्रिय रोगों को दूर करने के लिए सूर्य-चन्द्र के सम्पर्क में रहने का विधान है [१]। तीसरे मन्त्र में अर्जुनवृक्ष, यवतुषु तथा तिलपिजी को क्षेत्रिय रोग का नाशक बताया है। अगले सूक्त में ग्राही-गठिया को दूर करने के लिए दशवृक्ष का उल्लेख है।