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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 2/5/4

36 Sukta
7 Mantra
2/5/4
Devata- इन्द्रः Rishi- भृगुराथर्वणः Chhanda- पुरोविराड्जगती Suktam- इन्द्रशौर्य सूक्त
Mantra with Swara
आ त्वा॑ विशन्तु सु॒तास॑ इन्द्र पृ॒णस्व॑ कु॒क्षी वि॒ड्ढि श॑क्र धि॒येह्या नः॑। श्रु॒धी हवं॒ गिरो॑ मे जुष॒स्वेन्द्र॑ स्व॒युग्भि॒र्मत्स्वे॒ह म॒हे रणा॑य ॥

आ । त्वा॒ । वि॒श॒न्तु॒ । सु॒तास॑: । इ॒न्द्र॒: । पृ॒णस्व॑ । कु॒क्षी इति॑ । वि॒ड्ढि । श॒क्र॒ । धि॒या । इ॒हि॒ । आ । न॒: । श्रु॒धि । हव॑म् । गिर॑: । मे॒ । जु॒ष॒स्व॒ । आ । इ॒न्द्र॒ । स्व॒युक्ऽभि॑: । मत्स्व॑ । इ॒ह । म॒हे । रणा॑य ॥५.४॥

Mantra without Swara
आ त्वा विशन्तु सुतास इन्द्र पृणस्व कुक्षी विड्ढि शक्र धियेह्या नः। श्रुधी हवं गिरो मे जुषस्वेन्द्र स्वयुग्भिर्मत्स्वेह महे रणाय ॥

आ । त्वा । विशन्तु । सुतास: । इन्द्र: । पृणस्व । कुक्षी इति । विड्ढि । शक्र । धिया । इहि । आ । न: । श्रुधि । हवम् । गिर: । मे । जुषस्व । आ । इन्द्र । स्वयुक्ऽभि: । मत्स्व । इह । महे । रणाय ॥५.४॥

Meaning
१. हे (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष (सुतास:) = ये उत्पन्न हुए सोमकण (त्वा आविशन्तु) = तुझमें प्रवेश करें। (कुक्षी पुणस्व) = तू अपनी दोनों कोखों को इनसे प्रीणित करनेवाला हो। (विडि) = [विध शासने] तू अपने पर शासन करनेवाला बन । प्रभु कहते हैं कि (शक्र) = सोमपान के द्वारा शक्तिशाली बने हुए इन्द्र ! तू सोमपान के द्वारा तीन बनी हुई (धिया) = बुद्धि से (न: आयाहि) = हमारे समीप प्राप्त हो। (हवं श्रुधि) = हृदयस्थ मेरी वाणी को सुन। (मे गिरः) = मेरी वेदज्ञानरूपी वाणियों को (जुषस्व) = प्रीतिपूर्वक सेवन कर और (इह) = इसी जीवन में (महे रणाय) = महान् संग्राम के लिए काम-क्रोधादि शत्रुओं को पराजित करने के लिए (स्वयुग्भि:) = आत्मतत्त्व से मेलवाली इन इन्द्रियों से (मत्स्व) = आनन्द का अनुभव कर। इन्द्रियों को बाह्य विषयों से हटाकर अन्तर्मुख करने पर ही इन संग्रामों में विजय सम्भव होती है।
Essence
हम सोम का रक्षण करें। हृदयस्थ प्रभु की वाणी को सुनें। इन्द्रियों को निरुद्ध करने का प्रयत्न करें। कामादि के साथ होनेवाले महान् संग्राम में पराजित न हों।

 
Subject
आत्मशासन व संग्राम-विजय

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