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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 2/4/6

36 Sukta
6 Mantra
2/4/6
Devata- चन्द्रमा अथवा जङ्गिडः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- दीर्घायु प्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
कृ॑त्या॒दूषि॑र॒यं म॒णिरथो॑ अराति॒दूषिः॑। अथो॒ सह॑स्वान् जङ्गि॒डः प्र ण॒ आयुं॑षि तारिषत् ॥

कृ॒त्या॒ऽदूषि॑: । अ॒यम् । म॒णि: । अथो॒ इति॑ । अ॒रा॒ति॒ऽदूषि॑: । अथो॒ इति॑ । सह॑स्वान् । ज॒ङ्गि॒ड: । प्र । न॒: । आयूं॑षि । ता॒रि॒ष॒त् ॥४.६॥

Mantra without Swara
कृत्यादूषिरयं मणिरथो अरातिदूषिः। अथो सहस्वान् जङ्गिडः प्र ण आयुंषि तारिषत् ॥

कृत्याऽदूषि: । अयम् । मणि: । अथो इति । अरातिऽदूषि: । अथो इति । सहस्वान् । जङ्गिड: । प्र । न: । आयूंषि । तारिषत् ॥४.६॥

Meaning
१. 'कृञ् हिंसायाम्' धातु से 'कृत्या' शब्द बनता है [कृणोति- Kil] । (अयं मणि:) = यह वीर्यरूप जङ्गिड मणि (कृत्यादूषि:) = हिंसा को दूषित-दूर करनेवाली है। इसके शरीर में धारण से शरीर रोगों से हिंसित नहीं होता। २. (अथ उ) = और निश्चय से यह मणि (अरातिषि:) = शत्रुभूत रोगों को दूर करनेवाली है। 'अराति' का ठीक अर्थ 'न देना' है। गतमन्त्र में वर्णित 'शण' मणि अराति को दूषित करनेवाली-अत्यागवृत्ति को नष्ट करनेवाली है। ३. (अथ उ) = और निश्चय से (जङ्गिड:) = वीर्यरूप मणि (सहस्वान्) = सब रोगों को पराभूत करनेवाली है। रोगों को दूर करके यह (न:) = हमारी (आयूंषि) = आयुओं को (प्रतारिषत्) = खूब दीर्घ करे।
Essence
वीर्यरक्षण से हम रोगकृमियों द्वारा होनेवाली हिंसा से बचते हैं और अत्याग की वृत्ति से ऊपर उठते हैं। यह वीर्यमणि हमारे जीवन को दीर्घ करती है।
Subject
कृत्या व अराति-दूषण
Special
यह सुक्त वीर्यरक्षण के महत्व को बड़ी सुन्दरता से व्यक्त करता है। अगले सूक्त में इस वीर्यरक्षक 'इन्द्र' का चित्रण है। यह तपस्वी बनकर वीर्यरक्षा करता है, अतः भृगु है और चित्तवृत्ति को डाँवाडोल नहीं होने देता, इसलिए 'आथर्वण' है। इसे प्रभु उपदेश देते हैं |

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