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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 2/35/5

36 Sukta
5 Mantra
2/35/5
Devata- विश्वकर्मा Rishi- अङ्गिराः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Suktam- विश्वकर्मा सूक्त
Mantra with Swara
य॒ज्ञस्य॒ चक्षुः॒ प्रभृ॑ति॒र्मुखं॑ च वा॒चा श्रोत्रे॑ण॒ मन॑सा जुहोमि। इ॒मं य॒ज्ञं वित॑तं वि॒श्वक॑र्म॒णा दे॒वा य॑न्तु सुमन॒स्यमा॑नाः ॥

य॒ज्ञस्य॑ । चक्षु: । प्रऽभृ॑ति: । मुख॑म् । च॒ । वा॒चा । श्रोत्रे॑ण । मन॑सा । जु॒हो॒मि॒ । इ॒मम् । य॒ज्ञम् । विऽत॑तम् । वि॒श्वऽक॑र्मणा । आ । दे॒वा: । य॒न्तु॒ । सु॒ऽम॒न॒स्यमा॑ना: ॥३५.५॥

Mantra without Swara
यज्ञस्य चक्षुः प्रभृतिर्मुखं च वाचा श्रोत्रेण मनसा जुहोमि। इमं यज्ञं विततं विश्वकर्मणा देवा यन्तु सुमनस्यमानाः ॥

यज्ञस्य । चक्षु: । प्रऽभृति: । मुखम् । च । वाचा । श्रोत्रेण । मनसा । जुहोमि । इमम् । यज्ञम् । विऽततम् । विश्वऽकर्मणा । आ । देवा: । यन्तु । सुऽमनस्यमाना: ॥३५.५॥

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Meaning
१. वे प्रभु (यज्ञस्य चक्षुः) = यज्ञ के दिखलानेवाले हैं, अज्ञों का ज्ञान देनेवाले हैं, (प्रभृति:) = वे ही इन यज्ञों का भरण करनेवाले हैं, प्रभुकृपा के बिना कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं होता। (मुखंच) = वे प्रभु ही इस यज्ञ के मुख हैं-प्रवर्तक हैं, प्रत्येक यज्ञ प्रभु की उपासना से ही आरम्भ हुआ करता है। २. इसलिए (वाचा) = प्रभु के गुणों का उच्चारण करती हुई वाणी से, (श्रोत्रेण) = प्रभु-गुण श्रवण करते हुए कानों से, (मनसा) = प्रभु की महिमा का मनन करते हुए मन से (जुहोमि) = मैं प्रभु के प्रति अपना अर्पण करता हूँ। ३. (विश्वकर्मणा) = कों को सम्पूर्णरूप से करनेवाले प्रभु से (विततम्) = विस्तृत किये गये (इमं यज्ञम्) = इस यज्ञ को (सुमनस्यमाना:) = उत्तम मनवालों की भांति आचरण करते हुए (देवा:) = देववृत्ति के पुरुष (यन्तु) = प्राप्त हों। यज्ञों को करें, परन्तु इन यज्ञों को प्रभु से सम्पन्न होता हुआ जानें। इसप्रकार अहंकारशून्य होते हुए उत्तम मनवाले बने रहें। अहंकार आया तो यह देवों का यज्ञ न होकर असुरों का यज्ञ हो जाता है। 'यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधि पूर्वकम्।
Essence
हम यज्ञों में प्रवृत्त हों, परन्तु उन यज्ञों को प्रभु से होता हुआ जानें।
Subject
मुख्य होता 'प्रभु'
Special
प्रस्तुत सूक्त में यज्ञमय जीवन का प्रतिपादन है। इसी यज्ञ में सहायता के लिए पति पत्नी का व पत्नी पति का वरण करती है। 'पत्युनों यज्ञसंयोगे' इस सूत्र से यज्ञसंयोग में पत्नी शब्द बनता है। पति-पत्नी को मिलकर यज्ञ को सिद्ध करना है, अत: अगला सूक्त 'पतिवेदन ऋषि का है। पति 'अग्नि' है तो पत्नी 'सोम'। पति-पत्नी के विषय में मन्त्र कहता