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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 2/34/2

36 Sukta
5 Mantra
2/34/2
Devata- देवगणः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- पशुगण सूक्त
Mantra with Swara
प्र॑मु॒ञ्चन्तो॒ भुव॑नस्य॒ रेतो॑ गा॒तुं ध॑त्त॒ यज॑मानाय देवाः। उ॒पाकृ॑तं शशमा॒नं यदस्था॑त्प्रि॒यम्दे॒वाना॒मप्ये॑तु॒ पाथः॑ ॥

प्र॒ऽमु॒ञ्चन्त॑: । भुव॑नस्‍य । रेत॑: । गा॒तुम् । ध॒त्त॒ । यज॑मानाय । देवा॒: । उ॒प॒ऽआकृ॑तम् । श॒श॒मा॒नम् । यत् । अस्था॑त् । प्रि॒यम् । दे॒वाना॑म् । अपि॑ । ए॒तु॒ । पाथ॑: ॥३४.२॥

Mantra without Swara
प्रमुञ्चन्तो भुवनस्य रेतो गातुं धत्त यजमानाय देवाः। उपाकृतं शशमानं यदस्थात्प्रियम्देवानामप्येतु पाथः ॥

प्रऽमुञ्चन्त: । भुवनस्‍य । रेत: । गातुम् । धत्त । यजमानाय । देवा: । उपऽआकृतम् । शशमानम् । यत् । अस्थात् । प्रियम् । देवानाम् । अपि । एतु । पाथ: ॥३४.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार जो वैषयिक वृत्ति से ऊपर उठेंगे वे देव बनेंगे। इन देवों से कहते हैं कि-हे (देवाः) =  देववृत्ति के पुरुषो! (भुवनस्य) = [भुवन Becoming prosperous] समृद्ध होने का साधनभूत जो (रेत:) = वीर्य है, उस वीर्यशक्ति को (प्रमुञ्चन्त:) = धारण करते हुए [put on, wear] अथवा वासनाओं से मुक्त करते हुए [liberate] तुम (यजमानाय) = सृष्टियज्ञ के रचयिता प्रभु की प्राप्ति के लिए (गातुम्) = मार्ग को (धत्त) = धारण करो। वस्तुत: वीर्यरक्षण ही प्रभु-प्रासि का साधन बनता है। इस लोक में भी यह वीर्यरक्षण ही समृद्धि का साधन बनता है। २. (यत् उपाकृतम् अस्थात्) = जो सम्यक्तया संस्कृत किया गया है, (शशमानम्) = [अर्चतिकर्मा-नि० ३.१४] जो अर्चित व पूजित है, (देवानां प्रियम्) = चक्षु आदि सब इन्द्रियों का तर्पण करनेवाला है [प्री तर्पणे] वह (पाथः) = अन्न (अपि एतु) = हमारी ओर आनेवाला हो, हमें प्राप्त हो।
Essence
हम वीर्यरक्षण के द्वारा प्रभु-प्रासि के मार्ग पर चलें। सुसंस्कृत, पूजित, इन्द्रिय शक्ति को बढ़ानेवाले अन्नों को खाएँ। ऐसे अन्न का सेवन वीर्यरक्षण में सहायक होता है।
Subject
वीर्यरक्षण व सात्विक अन्न-सेवन