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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 2/32/4

36 Sukta
6 Mantra
2/32/4
Devata- आदित्यगणः Rishi- काण्वः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- कृमिनाशक सूक्त
Mantra with Swara
ह॒तो राजा॒ क्रिमी॑णामु॒तैषां॑ स्थ॒पति॑र्ह॒तः। ह॒तो ह॒तमा॑ता॒ क्रिमि॑र्ह॒तभ्रा॑ता ह॒तस्व॑सा ॥

ह॒त: । राजा॑ । क्रिमी॑णाम् । उ॒त । ए॒षा॒म् । स्थ॒पति॑: । ह॒त: । ह॒त: । ह॒तऽमा॑ता । क्रिमि॑: । ह॒तऽभ्रा॑ता । ह॒तऽस्व॑सा ॥३२.४॥

Mantra without Swara
हतो राजा क्रिमीणामुतैषां स्थपतिर्हतः। हतो हतमाता क्रिमिर्हतभ्राता हतस्वसा ॥

हत: । राजा । क्रिमीणाम् । उत । एषाम् । स्थपति: । हत: । हत: । हतऽमाता । क्रिमि: । हतऽभ्राता । हतऽस्वसा ॥३२.४॥

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Meaning
१. (क्रिमीणां राजा हत:) ृ गतमन्त्र में वर्णित कृमियों का राजा अगस्त्य के द्वारा विचारपूर्वक किये गये औषधप्रयोग से [मन्त्रौषधि प्रयोग से] मारा गया है, (उत) ृ और (एषाम्) ृ इन कृमियों का (स्थपति:) ृ स्थान का रक्षक अथवा सचिव (हत:) ृ मारा गया है। २. (इतमाता) ृ जिसकी माता का विनाश कर दिया गया है, (हतभ्राता:) ृ जिसके भाई को मार दिया गया है। (उत स्वसा) = जिसकी बहिन को भी नष्ट कर दिया गया है, ऐसा यह (क्रिमि:) = कृमि (हत:) = हिंसित हुआ है। संक्षेप में अपने सारे परिवार व राष्ट्रसहित यह कृमि समाप्त हो गया है।
Essence
ज्ञानपूर्वक ओषधिप्रयोग से रोगकृमियों का मूलोच्छेद कर दिया जाता है।
Subject
सराष्ट्र 'कमि' विनाश