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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 2/31/4

36 Sukta
5 Mantra
2/31/4
Devata- मही अथवा चन्द्रमाः Rishi- काण्वः Chhanda- उपरिष्टाद्विराड्बृहती Suktam- कृमिजम्भन सूक्त
Mantra with Swara
अन्वा॑न्त्र्यं॒ शीर्ष॒ण्य॑१मथो॒ पार्ष्टे॑यं॒ क्रिमी॑न्। अ॑वस्क॒वं व्य॑ध्व॒रं क्रिमी॒न्वच॑सा जम्भयामसि ॥

अनु॑ऽआन्त्र्यम् । शी॒र्ष॒ण्य॑म् । अथो॒ इति॑ । पार्ष्टे॑यम् । क्रिमी॑न् । अ॒व॒स्क॒वम्। वि॒ऽअ॒ध्व॒रम् । क्रिमी॑न् । वच॑सा । ज॒म्भ॒या॒म॒सि॒ ॥३१.४॥

Mantra without Swara
अन्वान्त्र्यं शीर्षण्य१मथो पार्ष्टेयं क्रिमीन्। अवस्कवं व्यध्वरं क्रिमीन्वचसा जम्भयामसि ॥

अनुऽआन्त्र्यम् । शीर्षण्यम् । अथो इति । पार्ष्टेयम् । क्रिमीन् । अवस्कवम्। विऽअध्वरम् । क्रिमीन् । वचसा । जम्भयामसि ॥३१.४॥

Meaning
१. (अन्वान्त्रयम्) = क्रमशः आँतो में फैलते जानेवाले कृमियों को (शीर्षण्यम्) = सिर में विकार के कारणभूत कृमियों को (अथ उ) = और निश्चय से (पायम्) = [पृष्टिषु पावियवेषु भवम्] पसलियों में होनेवाले (क्रिमीन) = रोगकृमियों को (वचसा) = वचा ओषधि के प्रयोग से (जम्भयामसि) = हम नष्ट करते हैं। २. (अवस्कवम्) = [अव+स्कुञ् आप्नवणे] नीचे की ओर के स्वभावबाले-अन्दर और अन्दर प्रवेश करते चलने के स्वभाववाले तथा (व्यध्वरम्) = [वि+अध्य] विविध मागाँवाले, अनेक द्वार बनाकर गति करते हुए (क्रिमीन) = सब कृमियों को हम (वचसा जम्भयामसि) = वचा ओषधि के द्वारा नष्ट करते हैं।
Essence
'अन्वान्त्र्य, शीर्षण्य, पाप्टेंय, अवस्कव, व्यध्वर' आदि सब कृमियों को हम बचा ओषधि के द्वारा नष्ट करते हैं।
Subject
विविध रोगकृमि

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