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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 2/3/1

36 Sukta
6 Mantra
2/3/1
Devata- भैषज्यम्, आयुः, धन्वन्तरिः Rishi- अङ्गिराः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- आस्रावभेषज सूक्त
Mantra with Swara
अ॒दो यद॑व॒धाव॑त्यव॒त्कमधि॒ पर्व॑तात्। तत्ते॑ कृणोमि भेष॒जं सुभे॑षजं॒ यथास॑सि ॥

अ॒द: । यत् । अ॒व॒ऽधाव॑ति । अ॒व॒त्ऽकम् । अधि॑ । पर्व॑तात् । तत् । ते॒ । कृ॒णो॒मि॒ । भे॒ष॒जम् । सुऽभे॑षजम् । यथा॑ । अस॑सि ॥३.१॥

Mantra without Swara
अदो यदवधावत्यवत्कमधि पर्वतात्। तत्ते कृणोमि भेषजं सुभेषजं यथाससि ॥

अद: । यत् । अवऽधावति । अवत्ऽकम् । अधि । पर्वतात् । तत् । ते । कृणोमि । भेषजम् । सुऽभेषजम् । यथा । अससि ॥३.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (अदः) = वह (यत्) = जो (अवस्कम्) = रक्षा करनेवाला जल (अधिपर्वतात्) = पर्वत पर से (अवधावति) = नीचे की ओर दौड़ता है, (तत) = उसे (ते) = तेरे लिए (भेषजम) = औषध (कृणोमि) = करता हैं, (यथा) = जिससे (सुभेषजम्) = उत्तम औषधवाला (अससि) = तू हो। २. पर्वतों से बहनेवाला जल भिन्न-भिन्न प्रकार के खनिजद्रव्यों के सम्पर्क में आता हुआ सचमुच कई रोगों का औषध बन जाता है। इन जलों में वे खनिजद्रव्य सूक्ष्मरूप से समवेत होकर जलों के दोष-निवारक गुणों को बढ़ा देते हैं। जल भेषज हैं, तो उन द्रव्यों के सम्पर्क से वे सुभेषज हो जाते हैं।
Essence
पर्वतों से बहकर नीचे आनेवाला जल भेषज है, भेषज ही नहीं सुभेषज है।
Subject
पर्वतीय जल